yeh log jo apne gharon ka nizaam durust nahi kar sakte, yeh log jinka character be-had past hota hai, siyaasat ke maidan mein apne watan ka nizaam theek karne aur logon ko akhlaaqiyaat ka sabaq dene ke liye nikalte hain... kis qadar mazhaka-khez cheez hai!
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लोग सुन कर वाह-वाही करते हैं हर बार ही रोज़ ही रोता हूँ अब तो मैं किसी सुर-ताल में
nakul kumar
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इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
Bashir Badr
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अपने में'यार से नीचे तो मैं आने से रहा शे'र भूखा हूँ मगर घास तो खाने से रहा
Mehshar Afridi
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इतना संगीन पाप कौन करे मेरे दुख पर विलाप कौन करे चेतना मर चुकी है लोगों की पाप पर पश्चाताप कौन करे
Azhar Iqbal
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लोग काँटों से बच के चलते हैं मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं
Unknown
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ज़िंदगी का हर वरक़ बा-शौक़ पढ़िए ये किताब इक रोज़ लौटानी भी तो है
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ये चाँद तुम्हारे मुक़ाबिल भी तो नहीं मैं तुम को देख के ईद मनाऊँगा
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तुम उतर जाओ इन निगाहों में इक नज़र देखने से क्या होगा
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ज़िंदगी भर यूँँ मेरे दिल को दुखाया था बहुत क़ब्र पर आया है वो मुझ से मुआ'फ़ी के लिए
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तुम्हें पता नहीं यहाँ कि कौन हूँ यहाँ का मैं सलाम करता है मुझे यहाँ का बादशाह भी
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