सूखी धरती पर जैसे नीलोफ़र खिल आए हों, ऐसा ही लगता है जब हम उन सेे मिल आए हों
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इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
Bashir Badr
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कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
Kumar Vishwas
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किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा
Munawwar Rana
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मुझ ऐसा शख़्स अगर क़हक़हों से भर जाए ये साँस लेती उदासी तो घुट के मर जाए वो मेरे बा'द तरस जाएगा मोहब्बत को उसे ये कहना अगर हो सके तो मर जाए
Rakib Mukhtar
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भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब कि जैसे तू ने हथेली पे गाल रक्खा है
Ahmad Faraz
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उस के दर पर ही बिला शर्त खड़े रहते हैं जैसे परवाने हों जो लौ से अड़े रहते हैं उस का दिल दिल नहीं मयख़ाना हो जैसे यारों चार छह लोग जहाँ यूँँ ही पड़े रहते हैं
DEVANSH TIWARI
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वो मुझे पूछते हैं गाँव में क्या रक्खा है मैं उन्हें कहता हूँ सब मेरे बड़े रहते हैं
DEVANSH TIWARI
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दग़ा का सोचते ही जाँ मुझ पर मेरी तस्वीर हँसने वाली थी
DEVANSH TIWARI
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भूल-भुलैया में भी हम को इक-इक रस्ता याद रहा उन आँखों में जबसे देखा अपना ठिकाना भूल गए
DEVANSH TIWARI
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सुन रहा हूँ जा रहे हो, ठीक है दूरियाँ अपना रहे हो, ठीक है कह रहे थे साथ दोगे उम्र भर बीच में ही जा रहे हो, ठीक है
DEVANSH TIWARI
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