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सुनो जानाँ तुम आओ तो दिसंबर तक चली आना गुज़र जाए न अब की जनवरी भी हिज्र में जानाँ

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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा

Santosh S Singh

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जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है

Shabeena Adeeb

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देखो हम कोई वहशी नहीं दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नहीं लगवाने हैं

Varun Anand

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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं

Azhar Iqbal

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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है

Zubair Ali Tabish

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जिस तरह से निकाले गए आज हम दर्द अपना कहें तो किसे आज हम ज़िंदगी के सिखाए थे मतलब जिन्हें क़त्ल उन के ही हाथों हुए आज हम

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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बात कहनी थी ये बस उसी का हूँ मैं हर घड़ी याद में उस की रोता हूँ मैं सुन रही हो इसी भीड़ में वो मुझे बस इसी आस में गीत गाता हूँ मैं

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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गर्व मुझ को क्यूँ न हो ख़ुद पर भला जन्म क्षत्रिय वंश में मैं ने लिया नाम है संदीप ग़ज़लों में शफ़क़ ग्राम बड़दा है जहाँ माँ नर्मदा

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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ज़मीं सर पे उठा लूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं गगन को भी कुचल दूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं भला औक़ात क्या इस चाँद की उस चाँद के आगे हज़ारों चाँद वारूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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लो फिर दिसंबर आ गया, हाँ फिर दिसंबर आ गया अगले महीने जनवरी में फिर नया साल आ गया

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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