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गर्व मुझ को क्यूँ न हो ख़ुद पर भला जन्म क्षत्रिय वंश में मैं ने लिया नाम है संदीप ग़ज़लों में शफ़क़ ग्राम बड़दा है जहाँ माँ नर्मदा

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ज़मीं सर पे उठा लूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं गगन को भी कुचल दूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं भला औक़ात क्या इस चाँद की उस चाँद के आगे हज़ारों चाँद वारूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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जिस तरह से निकाले गए आज हम दर्द अपना कहें तो किसे आज हम ज़िंदगी के सिखाए थे मतलब जिन्हें क़त्ल उन के ही हाथों हुए आज हम

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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अगर जो साथ है तेरा,मुझे किस बात की चिंता नसीबों से जो है मिलता,है भाई तू वही हीरा

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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सुनो जानाँ तुम आओ तो दिसंबर तक चली आना गुज़र जाए न अब की जनवरी भी हिज्र में जानाँ

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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यक़ीं कर लो इन्हें पढ़ कर तुम्हीं ख़ुद कही है "मीर" ने दमदार ग़ज़लें

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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