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लो फिर दिसंबर आ गया, हाँ फिर दिसंबर आ गया अगले महीने जनवरी में फिर नया साल आ गया

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साथ हँसने लगे वो हँसी चाहिए उम्र भर के लिए बस यही चाहिए बिन तेरे हो अगर चार दिन ज़िंदगी एक पल भी नहीं ज़िंदगी चाहिए

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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ज़मीं सर पे उठा लूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं गगन को भी कुचल दूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं भला औक़ात क्या इस चाँद की उस चाँद के आगे हज़ारों चाँद वारूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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इमारतों से शहर भर गया है अब न बच सका कोई भी इंसाँ शहर में

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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बात कहनी थी ये बस उसी का हूँ मैं हर घड़ी याद में उस की रोता हूँ मैं सुन रही हो इसी भीड़ में वो मुझे बस इसी आस में गीत गाता हूँ मैं

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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हर किसी का घर हो रौशन इस दिवाली कोई सूना हो न आँगन इस दिवाली इस दिवाली कोई भूखा भी न सोए सब की थाली में हो भोजन इस दिवाली हर दिया रौशन करे सरहद को जगमग घुस न पाए कोई दुश्मन इस दिवाली घर सजाकर करना स्वागत लक्ष्मी का लक्ष्मी आएगी छन छन इस दिवाली मन लगाकर करना पूजा तुम "शफ़क़" जी फिर पटाख़े होंगे दन दन इस दिवाली

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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