हर किसी का घर हो रौशन इस दिवाली कोई सूना हो न आँगन इस दिवाली इस दिवाली कोई भूखा भी न सोए सब की थाली में हो भोजन इस दिवाली हर दिया रौशन करे सरहद को जगमग घुस न पाए कोई दुश्मन इस दिवाली घर सजाकर करना स्वागत लक्ष्मी का लक्ष्मी आएगी छन छन इस दिवाली मन लगाकर करना पूजा तुम "शफ़क़" जी फिर पटाख़े होंगे दन दन इस दिवाली
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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भीगीं पलकें देख कर तू क्यूँँ रुका है ख़ुश हूँ मैं वो तो मेरी आँख में कुछ आ गया है ख़ुश हूँ मैं वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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सौ सौ उमीदें बँधती है इक इक निगाह पर मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई
Allama Iqbal
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वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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देखो हम कोई वहशी नहीं दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नहीं लगवाने हैं
Varun Anand
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ज़मीं सर पे उठा लूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं गगन को भी कुचल दूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं भला औक़ात क्या इस चाँद की उस चाँद के आगे हज़ारों चाँद वारूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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साथ हँसने लगे वो हँसी चाहिए उम्र भर के लिए बस यही चाहिए बिन तेरे हो अगर चार दिन ज़िंदगी एक पल भी नहीं ज़िंदगी चाहिए
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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ये ग़ुरूर-ए-दौलत टिकता नहीं ज़ियादा दिन लोग चाहते हैं अब राज हो मुहब्बत का
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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जिस तरह से निकाले गए आज हम दर्द अपना कहें तो किसे आज हम ज़िंदगी के सिखाए थे मतलब जिन्हें क़त्ल उन के ही हाथों हुए आज हम
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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सुनो जानाँ तुम आओ तो दिसंबर तक चली आना गुज़र जाए न अब की जनवरी भी हिज्र में जानाँ
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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