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तीरगी-ए-ज़ीस्त कर दी ख़त्म इसने रौशनी है फूल सी बच्ची हमारी

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उस की जुल्फ़ें उदास हो जाए इस-क़दर रौशनी भी ठीक नहीं तुम ने नाराज़ होना छोड़ दिया इतनी नाराज़गी भी ठीक नहीं

Fahmi Badayuni

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किसी बहाने से उस की नाराज़गी ख़त्म तो करनी थी उस के पसंदीदा शाइ'र के शे'र उसे भिजवाए हैं

Ali Zaryoun

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इस तरह करता है हर शख़्स सफ़र अपना ख़त्म ख़ुद को तस्वीर में रखता है चला जाता है

Sandeep kumar

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मुझे अँधेरे से बात करनी है सो करा दो, दिया बुझा दो कुछ एक लम्हों को रौशनी का गला दबा दो, दिया बुझा दो रिवाज़-ए-महफ़िल निभा रहा हूँ बता रहा हूँ मैं जा रहा हूँ मुझे विदा दो, जो रोना चाहे उन्हें बुला दो, दिया बुझा दो

Vikram Gaur Vairagi

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निगाह-ए-शोख़ का क़ैदी नहीं है कौन यहाँ किसे तमन्ना नहीं फूल चूमने को मिले

Aks samastipuri

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