ये कैसा इम्तिहाँ आख़िर ये कैसी आज़माइश है समझ में आ गया है सब दिली क्या तेरी ख़्वाहिश है अगर तू चाहता है ऐसा तो ले होने देता हूँ वगरना जानता हूँ पहले से क्या तेरी साज़िश है
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क्या ग़लत-फ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं
Tehzeeb Hafi
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उस को भुला कर मुझ को ये मालूम हुआ आदत कैसी भी हो छोड़ी जा सकती है
Nadeem Shaad
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इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
Bashir Badr
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तुझे न आएँगी मुफ़्लिस की मुश्किलात समझ मैं छोटे लोगों के घर का बड़ा हूँ बात समझ
Umair Najmi
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गाली को प्रणाम समझना पड़ता है मधुशाला को धाम समझना पड़ता है आधुनिक कहलाने की अंधी जिद में रावण को भी राम समझना पड़ता है
Azhar Iqbal
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ज़रूरत क्या तिजारत-गार को ख़ुद हाथ रँगने की ठिकाने कुछ लगाना हो अगर सरकार बैठी है
Mohit Subran
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ज़रा से शक पे हुआ ख़त्म राब्ता लेकिन ज़रा सा शक न हुआ ख़त्म दरमियाँ से मगर
Mohit Subran
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यूँँ पाँव पाँव चला उम्र भर मगर देखो चला जहाँ से था मैं लौट के वहीं पहुँचा नहीं ये बात नहीं तय सफ़र किया ही नहीं रहा सफ़र में ही फिर भी कहीं नहीं पहुँचा
Mohit Subran
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तुम्हें तो यार मुयस्सर है बस ख़ुशी ही ख़ुशी तुम्हारा क्या जिसे चाहो उसे उदास करो
Mohit Subran
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सुनता है भला कौन यहाँ दर्द किसी का मैं ख़ुश था चलो मेरी परेशानी को पूछा उस वक़्त इन आँखों में मिरी पानी भर आया जब शहर में मुझ से किसी ने पानी को पूछा
Mohit Subran
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