ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता
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घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
Tehzeeb Hafi
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गले तो लगना है उस से कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए
Tehzeeb Hafi
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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया
Tehzeeb Hafi
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बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
Firaq Gorakhpuri
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इश्क़ करना इक सज़ा है क्या करें इश्क़ का अपना मज़ा है क्या करें
Syed Naved Imam
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मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है मेरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है
Dagh Dehlvi
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ना-उमीदी बढ़ गई है इस क़दर आरज़ू की आरज़ू होने लगी
Dagh Dehlvi
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रहा न दिल में वो बे-दर्द और दर्द रहा मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था
Dagh Dehlvi
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हाथ रख कर जो वो पूछे दिल-ए-बेताब का हाल हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं
Dagh Dehlvi
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जब आँखों में लगाता हूँ तो चुपके-चुपके हंस-हंसकर तेरी तस्वीर भी कहती है, सूरत ऐसी होती है
Dagh Dehlvi
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