Top 20 Sher Series

Shayari of Firaq Gorakhpuri

Shayari of Firaq Gorakhpuri ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.

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Sher

18

Featured Picks

Series se pehle kuch standout sher padhein.

एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

यह दो पंक्तियाँ मन की उलझन दिखाती हैं: याद न आना और भूल जाना एक बात नहीं। बोलने वाला कहता है कि लंबे समय से खयाल नहीं आया, फिर भी मन के अंदर का लगाव खत्म नहीं हुआ। दूरी और चुप्पी के बीच भी प्यार की हल्की मौजूदगी बनी रहती है।

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं

इस शेर में बाहर की धुंधली शाम और भीतर की उदासी एक-दूसरे से जुड़ जाती है। धुआँ-धुआँ वातावरण मन की उलझन और भारीपन का रूपक है, और “हुस्न” का उदास होना बताता है कि खुशी देने वाली चीज़ें भी फीकी पड़ गई हैं। ऐसे समय कई पुरानी, अधूरी बातें याद की तरह उभरती हैं और मन से जाती नहीं—बस चुप-सी टीस बनकर रह जाती हैं।

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो तुम को देखें कि तुम से बात करें

यह शेर पास बैठे प्रिय की मौजूदगी में पैदा हुई मीठी झिझक को दिखाता है। देखने का सुख इतना गहरा है कि बोलने की हिम्मत रुक-रुक जाती है। मन में चाह भी है कि बात हो, और डर भी कि बोलते ही वह नाज़ुक सा पल टूट न जाए। इसी दुविधा में प्रेम की तीव्रता झलकती है।

कोई समझे तो एक बात कहूँ इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़' जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

यह शेर एक विडंबना दिखाता है: जहाँ मस्ती की उम्मीद होती है, वहीं पीकर आदमी गंभीर हो जाता है। यहाँ शराब केवल नशा नहीं, अनुभव और सच्चाई का प्रतीक भी है, जो हँसी को कम करके सोच को जगा देती है। भाव यह है कि जैसे ही अंदर समझ बढ़ती है, बेफिक्री खत्म हो जाती है।

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में

यह शेर बताता है कि जीवन का समय एक ही बात में खर्च हो गया—कभी याद में, कभी भूलने के प्रयास में। याद करना और भूलना अलग लगते हैं, पर दोनों में मन उसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। “कट गए” से दिन काटने का दर्द और थकान झलकती है। भावनात्मक सार यह है कि बिछोह ने जीने को संघर्ष बना दिया।

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं इक बुज़ुर्ग हम लोग भी फ़क़ीर उसी सिलसिले के हैं

कवि प्रेम को एक साधना की तरह दिखाता है, जैसे उसकी भी कोई परंपरा और गुरु-परंपरा हो। “महापुरुष” का उल्लेख प्रेम की ऊँचाई बताता है, और खुद को “भिखारी/साधक” कहना विनम्रता और समर्पण दिखाता है। भाव यह है कि हम भी उसी पवित्र प्रेम-मार्ग से जुड़े हुए हैं।

रात भी नींद भी कहानी भी हाए क्या चीज़ है जवानी भी

कवि ‘रात’, ‘नींद’ और ‘कहानी’ को जोड़कर जवानी की दुनिया को सपनों, कल्पना और प्रेम-भाव से भरा दिखाता है। ‘हाय’ में खुशी की चमक के साथ थोड़ा सा अफ़सोस भी है, मानो यह सब बहुत जल्दी बीत जाता हो। भाव यह है कि जवानी जादुई भी है और क्षणभंगुर भी।

ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त तिरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई

कवि मिलन के बाद आईना दिखाकर कहता है कि असर खुद दिख जाएगा। आईना यहाँ सच्चाई और अपने-आप को देखने का संकेत है, और “कुमारपन” सौंदर्य की कोमल, नई-सी चमक को बताता है। भाव यह है कि प्रेम और निकटता से सुंदरता घटती नहीं, बल्कि और निखर जाती है।

इसी खंडर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात

खंडहर जीवन की टूटन और खालीपन का संकेत है, और टूटे दीये बची हुई छोटी-सी आशा या सहारा। कवि कहता है कि पूरी रोशनी न सही, पर इन अधूरे दीयों से भी गुज़ारा कर लो, क्योंकि उदास रात दुख और अकेलेपन की लंबी घड़ी है। भाव यह है कि कठिन समय में थोड़ा-सा सहारा भी संभालने के काम आता है।

ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा और अगर रोइए तो पानी है

यह शेर दुःख से निपटने के दो तरीकों को दिखाता है: दबा लेना और रो देना। जब भावनाएँ दबाई जाती हैं तो भीतर की जलन बढ़ती है, इसलिए दिल को ‘अंगारा’ कहा गया है। रोने पर वही जलन ‘पानी’ बनकर आँसुओं में निकलती है और मन का बोझ कुछ हल्का होता है।

कौन ये ले रहा है अंगड़ाई आसमानों को नींद आती है

कवि साधारण-सी अंगड़ाई को बहुत बड़ा, ब्रह्मांड-सा असर देने वाली घटना बना देता है। आसमानों को नींद आना मानवीकरण है: जैसे किसी की हल्की-सी हरकत या रात की शांति से पूरे वातावरण पर सुस्ती और मिठास छा गई हो। इसमें चकित करने वाली कल्पना और प्रेम की नर्म-सी अनुभूति है।

एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

यह दो पंक्तियाँ मन की उलझन दिखाती हैं: याद न आना और भूल जाना एक बात नहीं। बोलने वाला कहता है कि लंबे समय से खयाल नहीं आया, फिर भी मन के अंदर का लगाव खत्म नहीं हुआ। दूरी और चुप्पी के बीच भी प्यार की हल्की मौजूदगी बनी रहती है।

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं

इस शेर में बाहर की धुंधली शाम और भीतर की उदासी एक-दूसरे से जुड़ जाती है। धुआँ-धुआँ वातावरण मन की उलझन और भारीपन का रूपक है, और “हुस्न” का उदास होना बताता है कि खुशी देने वाली चीज़ें भी फीकी पड़ गई हैं। ऐसे समय कई पुरानी, अधूरी बातें याद की तरह उभरती हैं और मन से जाती नहीं—बस चुप-सी टीस बनकर रह जाती हैं।

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो तुम को देखें कि तुम से बात करें

यह शेर पास बैठे प्रिय की मौजूदगी में पैदा हुई मीठी झिझक को दिखाता है। देखने का सुख इतना गहरा है कि बोलने की हिम्मत रुक-रुक जाती है। मन में चाह भी है कि बात हो, और डर भी कि बोलते ही वह नाज़ुक सा पल टूट न जाए। इसी दुविधा में प्रेम की तीव्रता झलकती है।

कोई समझे तो एक बात कहूँ इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़' जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

यह शेर एक विडंबना दिखाता है: जहाँ मस्ती की उम्मीद होती है, वहीं पीकर आदमी गंभीर हो जाता है। यहाँ शराब केवल नशा नहीं, अनुभव और सच्चाई का प्रतीक भी है, जो हँसी को कम करके सोच को जगा देती है। भाव यह है कि जैसे ही अंदर समझ बढ़ती है, बेफिक्री खत्म हो जाती है।

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में

यह शेर बताता है कि जीवन का समय एक ही बात में खर्च हो गया—कभी याद में, कभी भूलने के प्रयास में। याद करना और भूलना अलग लगते हैं, पर दोनों में मन उसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। “कट गए” से दिन काटने का दर्द और थकान झलकती है। भावनात्मक सार यह है कि बिछोह ने जीने को संघर्ष बना दिया।

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं इक बुज़ुर्ग हम लोग भी फ़क़ीर उसी सिलसिले के हैं

कवि प्रेम को एक साधना की तरह दिखाता है, जैसे उसकी भी कोई परंपरा और गुरु-परंपरा हो। “महापुरुष” का उल्लेख प्रेम की ऊँचाई बताता है, और खुद को “भिखारी/साधक” कहना विनम्रता और समर्पण दिखाता है। भाव यह है कि हम भी उसी पवित्र प्रेम-मार्ग से जुड़े हुए हैं।

रात भी नींद भी कहानी भी हाए क्या चीज़ है जवानी भी

कवि ‘रात’, ‘नींद’ और ‘कहानी’ को जोड़कर जवानी की दुनिया को सपनों, कल्पना और प्रेम-भाव से भरा दिखाता है। ‘हाय’ में खुशी की चमक के साथ थोड़ा सा अफ़सोस भी है, मानो यह सब बहुत जल्दी बीत जाता हो। भाव यह है कि जवानी जादुई भी है और क्षणभंगुर भी।

ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त तिरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई

कवि मिलन के बाद आईना दिखाकर कहता है कि असर खुद दिख जाएगा। आईना यहाँ सच्चाई और अपने-आप को देखने का संकेत है, और “कुमारपन” सौंदर्य की कोमल, नई-सी चमक को बताता है। भाव यह है कि प्रेम और निकटता से सुंदरता घटती नहीं, बल्कि और निखर जाती है।

इसी खंडर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात

खंडहर जीवन की टूटन और खालीपन का संकेत है, और टूटे दीये बची हुई छोटी-सी आशा या सहारा। कवि कहता है कि पूरी रोशनी न सही, पर इन अधूरे दीयों से भी गुज़ारा कर लो, क्योंकि उदास रात दुख और अकेलेपन की लंबी घड़ी है। भाव यह है कि कठिन समय में थोड़ा-सा सहारा भी संभालने के काम आता है।

ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा और अगर रोइए तो पानी है

यह शेर दुःख से निपटने के दो तरीकों को दिखाता है: दबा लेना और रो देना। जब भावनाएँ दबाई जाती हैं तो भीतर की जलन बढ़ती है, इसलिए दिल को ‘अंगारा’ कहा गया है। रोने पर वही जलन ‘पानी’ बनकर आँसुओं में निकलती है और मन का बोझ कुछ हल्का होता है।

कौन ये ले रहा है अंगड़ाई आसमानों को नींद आती है

कवि साधारण-सी अंगड़ाई को बहुत बड़ा, ब्रह्मांड-सा असर देने वाली घटना बना देता है। आसमानों को नींद आना मानवीकरण है: जैसे किसी की हल्की-सी हरकत या रात की शांति से पूरे वातावरण पर सुस्ती और मिठास छा गई हो। इसमें चकित करने वाली कल्पना और प्रेम की नर्म-सी अनुभूति है।

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