abad rahenge virane shadab rahengi zanjiren jab tak divane zinda hain phulengi phalengi zanjiren azadi ka darvaza bhi khud hi kholengi zanjiren tukde tukde ho jaengi jab had se badhengi zanjiren jab sab ke lab sil jaenge hathon se qalam chhin jaenge batil se loha lene ka elaan karengi zanjiren andhon bahron ki nagri men yuun kaun tavajjoh karta hai mahaul sunega dekhega jis vaqt bajengi zanjiren jo zanjiron se bahar hain azad unhen bhi mat samjho jab haath katenge zalim ke us vaqt katengi zanjiren aabaad rahenge virane shadab rahengi zanjiren jab tak diwane zinda hain phulengi phalengi zanjiren aazadi ka darwaza bhi khud hi kholengi zanjiren tukde tukde ho jaengi jab had se badhengi zanjiren jab sab ke lab sil jaenge hathon se qalam chhin jaenge baatil se loha lene ka elan karengi zanjiren andhon bahron ki nagri mein yun kaun tawajjoh karta hai mahaul sunega dekhega jis waqt bajengi zanjiren jo zanjiron se bahar hain aazad unhen bhi mat samjho jab hath katenge zalim ke us waqt katengi zanjiren
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दो नावों पर पाँव पसारे ऐसे कैसे वो भी प्यारा हम भी प्यारे ऐसे कैसे सूरज बोला बिन मेरे दुनिया अंधी है हँस कर बोले चाँद सितारे ऐसे कैसे तेरे हिस्से की ख़ुशियों से बैर नहीं पर मेरे हक़ में सिर्फ़ ख़सारे ऐसे कैसे गालों पर बोसा दे कर जब चली गई वो कहते रह गए होंठ बिचारे ऐसे कैसे मुझ जैसों को यां पर देख के कहते हैं वो इतना आगे बिना सहारे ऐसे कैसे जैसे ही मक़्ते पर पहुँची ग़ज़ल असद की बोल उठे सारे के सारे ऐसे कैसे
Asad Akbarabadi
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सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा-ए-मंज़िल में है आज फिर मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार बार आएँ वो शौक़-ए-शहादत जिन के जिन के दिल में है मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है माने-ए-इज़हार तुम को है हया, हम को अदब कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ हम अभी से क्यूँँ बताएँ क्या हमारे दिल में है अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़ सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-'बिस्मिल' में है
Bismil Azimabadi
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गले तो लगना है उस सेे कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़ तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए पता करूँँगा अँधेरे में किस से मिलता है और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से? कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए हर एक बात का मतलब निकालने वालों तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए
Tehzeeb Hafi
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वैसा कहाँ है हम से जैसा कि आगे था तू औरों से मिल के प्यारे कुछ और हो गया तू चालें तमाम बे-ढब बातें फ़रेब हैं सब हासिल कि ऐ शुक्र लब अब वो नहीं रहा तू जाते नहीं उठाए ये शोर हर सहर के या अब चमन में बुलबुल हम ही रहेंगे या तू आ अब्र एक दो दम आपस में रखें सोहबत कुढ़ने को हूँ मैं आँधी रोने को है बला तू तक़रीब पर भी तो तू पहलू तही करे है दस बार ईद आई कब कब गले मिला तू तेरे दहन से उस को निस्बत हो कुछ तो कहिए गुल गो करे है दा'वा ख़ातिर में कुछ न ला तू दिल क्यूँँके रास्त आवे दावा-ए-आश्नाई दरिया-ए-हुस्न वो मह-ए-कश्ती-ब-कफ़ गदा तू हर फ़र्द यास अभी से दफ़्तर है तुझ गले का है क़हर जब कि होगा हर्फ़ों से आश्ना तू आलम है शौक़-ए-कुश्ता-ए-ख़िल्क़त है तेरी रफ़्ता जानों की आरज़ू तू आँखों का मुद्दआ' तू मुँह करिए जिस तरफ़ को सो ही तिरी तरफ़ है पर कुछ नहीं है पैदा कीधर है ए ख़ुदा तू आती ब-ख़ुद नहीं है बाद-ए-बहार अब तक दो गाम था चमन में टक नाज़ से चला तू कम मेरी और आना कम आँख का मिलाना करने से ये अदाएँ है मुद्दआ' कि जा तू गुफ़्त-ओ-शुनूद अक्सर मेरे तिरे रहे है ज़ालिम मुआ'फ़ रखियो मेरा कहा-सुना तो कह साँझ के मूए को ऐ 'मीर' रोईं कब तक जैसे चराग़-ए-मुफ़्लिस इक-दम में जल बुझा तो
Meer Taqi Meer
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कर लूँगा जम्अ' दौलत-ओ-ज़र उस के बा'द क्या ले लूँगा शानदार सा घर उस के बा'द क्या मय की तलब जो होगी तो बन जाऊँगा मैं रिन्द कर लूँगा मय-कदों का सफ़र उस के बा'द क्या होगा जो शौक़ हुस्न से राज़-ओ-नियाज़ का कर लूँगा गेसुओं में सहर उस के बा'द क्या शे'र-ओ-सुख़न की ख़ूब सजाऊँगा महफ़िलें दुनिया में होगा नाम मगर उस के बा'द क्या मौज आएगी तो सारे जहाँ की करूँँगा सैर वापस वही पुराना नगर उस के बा'द क्या इक रोज़ मौत ज़ीस्त का दर खट-खटाएगी बुझ जाएगा चराग़-ए-क़मर उस के बा'द क्या उट्ठी थी ख़ाक ख़ाक से मिल जाएगी वहीं फिर उस के बा'द किस को ख़बर उस के बा'द क्या
Qamar Jalalabadi
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