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ashiqi men 'mir' jaise khvab mat dekha karo bavle ho jaoge mahtab mat dekha karo jasta jasta padh liya karna mazamin-e-vafa par kitab-e-ishq ka har baab mat dekha karo is tamashe men ulat jaati hain aksar kashtiyan dubne valon ko zer-e-ab mat dekha karo mai-kade men kya takalluf mai-kashi men kya hijab bazm-e-saqi men adab adab mat dekha karo ham se durveshon ke ghar aao to yaron ki tarah har jagah khas-khana o barfab mat dekha karo mange-tange ki qabaen der tak rahti nahin yaar logon ke laqab-alqab mat dekha karo tishnagi men lab bhigo lena bhi kaafi hai 'faraz' jaam men sahba hai ya zahrab mat dekha karo aashiqi mein 'mir' jaise khwab mat dekha karo bawle ho jaoge mahtab mat dekha karo jasta jasta padh liya karna mazamin-e-wafa par kitab-e-ishq ka har bab mat dekha karo is tamashe mein ulat jati hain aksar kashtiyan dubne walon ko zer-e-ab mat dekha karo mai-kade mein kya takalluf mai-kashi mein kya hijab bazm-e-saqi mein adab aadab mat dekha karo hum se durweshon ke ghar aao to yaron ki tarah har jagah khas-khana o barfab mat dekha karo mange-tange ki qabaen der tak rahti nahin yar logon ke laqab-alqab mat dekha karo tishnagi mein lab bhigo lena bhi kafi hai 'faraaz' jam mein sahba hai ya zahrab mat dekha karo

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम बात भी करते नहीं ग़म-ख़्वार के साथ हम ने इक उम्र बसर की है ग़म-ए-यार के साथ 'मीर' दो दिन न जिए हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम घर से निकलते हैं तो रख देते हैं ताक़ पर इज़्ज़त-ए-सादात भी दस्तार के साथ इस क़दर ख़ौफ़ है अब शहर की गलियों में कि लोग चाप सुनते हैं तो लग जाते हैं दीवार के साथ एक तो ख़्वाब लिए फिरते हो गलियों गलियों उस पे तकरार भी करते हो ख़रीदार के साथ शहर का शहर ही नासेह हो तो क्या कीजिएगा वर्ना हम रिंद तो भिड़ जाते हैं दो-चार के साथ हम को उस शहर में ता'मीर का सौदा है जहाँ लोग में'मार को चुन देते हैं दीवार के साथ जो शरफ़ हम को मिला कूचा-ए-जानाँ से 'फ़राज़' सू-ए-मक़्तल भी गए हैं उसी पिंदार के साथ

Ahmad Faraz

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यूँँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ ज़िंदगी हम तिरे हाथों से न मारे जाएँ अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ वो जो मौजूद नहीं उस की मदद चाहते हैं वो जो सुनता ही नहीं उस को पुकारे जाएँ बाप लर्ज़ां है कि पहुँची नहीं बारात अब तक और हम-जोलियाँ दुल्हन को सँवारे जाएँ हम कि नादान जुआरी हैं सभी जानते हैं दिल की बाज़ी हो तो जी जान से हारे जाएँ तज दिया तुम ने दर-ए-यार भी उकता के 'फ़राज़' अब कहाँ ढूँढ़ने ग़म-ख़्वार तुम्हारे जाएँ

Ahmad Faraz

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क्यूँँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं दोस्ती तो उदास करती नहीं हम हमेशा के सैर-चश्म सही तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन! इतनी आसानियों से मरती नहीं जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़ ज़िन्दगी उस तरह गुज़रती नहीं

Ahmad Faraz

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आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला तेरी बख़्शिश तिरी दहलीज़ पे धर जाएगा ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़' ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा

Ahmad Faraz

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जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी देखा तो वो तस्वीर हर इक दिल से लगी थी तन्हाई में रोते हैं कि यूँँ दिल को सुकूँ हो ये चोट किसी साहिब-ए-महफ़िल से लगी थी ऐ दिल तिरे आशोब ने फिर हश्र जगाया बे-दर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी ख़िल्क़त का अजब हाल था उस कू-ए-सितम में साए की तरह दामन-ए-क़ातिल से लगी थी उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया जब कश्ती-ए-जाँ मौत के साहिल से लगी थी

Ahmad Faraz

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