ghazalKuch Alfaaz

achchha to tum aise the duur se kaise lagte the haath tumhare shaal men bhi kitne thande rahte the samne sab ke us se ham khinche khinche se rahte the aankh kahin par hoti thi baat kisi se karte the qurbat ke un lamhon men ham kuchh aur hi hote the saath men rah kar bhi us se chalte vaqt hi milte the itne bade ho ke bhi ham bachchon jaisa rote the jald hi us ko bhuul gae aur bhi dhoke khane the achchha to tum aise the dur se kaise lagte the hath tumhaare shaal mein bhi kitne thande rahte the samne sab ke us se hum khinche khinche se rahte the aankh kahin par hoti thi baat kisi se karte the qurbat ke un lamhon mein hum kuchh aur hi hote the sath mein rah kar bhi us se chalte waqt hi milte the itne bade ho ke bhi hum bachchon jaisa rote the jald hi us ko bhul gae aur bhi dhoke khane the

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है उस एक पल से कभी कितना ख़ौफ़ खाया है उसी निगाह ने आँखों को कर दिया पत्थर उसी निगाह में सब कुछ नज़र भी आया है ये तंज़ यूँँ भी है इक इम्तिहान मेरे लिए तिरे लबों से कोई और मुस्कुराया है बहे रक़ीब के आँसू भी मेरे गालों पर ये सानेहा भी मोहब्बत में पेश आया है ये कोई और है तेरी तरफ़ सरकता हुआ अँधेरा होते ही जो मुझ में आ समाया है हमारे इश्क़ से मरऊब इस क़दर भी न हो ये ख़ूँ तो एक अदाकार ने बहाएा है यहाँ तो रेत है पत्थर हैं और कुछ भी नहीं वो क्या दिखाने मुझे इतनी दूर लाया है बहुत से बोझ हैं दिल पर ये कोई ऐसा नहीं ये दुख किसी ने हमारे लिए उठाया है

Shariq Kaifi

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लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी अब तो मश्कूक हुई अपनी मिलन-सारी भी वार कुछ ख़ाली गए मेरे तो फिर आ ही गई अपने दुश्मन को दुआ देने की हुश्यारी भी उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे वक़्त कम हो तो सजा देती है बीमारी भी किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक और मुकम्मल है जुदा होने की तय्यारी भी ऊब जाता हूँ ज़ेहानत की नुमाइश से तो फिर लुत्फ़ देता है ये लहजा मुझे बाज़ारी भी उम्र बढ़ती है मगर हम वहीं ठहरे हुए हैं ठोकरें खाईं तो कुछ आए समझदारी भी अब जो किरदार मुझे करना है मुश्किल है बहुत मस्त होने का दिखावा भी है सर भारी भी

Shariq Kaifi

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सामने तेरे हूँ घबराया हुआ बे-ज़बाँ होने पर शरमाया हुआ लाख अब मंज़र हो धुँदलाया हुआ याद है मुझ को नज़र आया हुआ ये भी कहना था बता कर रास्ता मैं वही हूँ तेरा भटकाया हुआ मैं कि इक आसेब इक बे-चैन रूह बे-वुज़ू हाथों का दफ़नाया हुआ आ गया फिर मशवरा देने मुझे ख़ेमा-ए-दुश्मन का समझाया हुआ फिर वो मंज़िल लुत्फ़ क्या देती मुझे मैं वहाँ पहुँचा था झुँझलाया हुआ तेरी गलियों से गुज़र आसाँ नहीं आज भी चलता हूँ घबराया हुआ कुछ नया करने का फिर मतलब ही क्या जब तमाशाई है उकताया हुआ कम से कम इस का तो रखता वो लिहाज़ मैं हूँ इक आवाज़ पर आया हुआ मुझ को आसानी से पा सकता है कौन मैं हूँ तेरे दर का ठुकराया हुआ

Shariq Kaifi

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कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए कोई मेरा भी बुरा चाहने वाला हो जाए इसी मजबूरी में ये भीड़ इकट्ठा है यहाँ जो तिरे साथ नहीं आए वो तन्हा हो जाए शुक्र उस का अदा करने का ख़याल आए किसे अब्र जब इतना घना हो कि अँधेरा हो जाए हाँ नहीं चाहिए उस दर्जा मोहब्बत तेरी कि मिरा सच भी तिरे झूट का हिस्सा हो जाए बंद आँखों ने सराबों से बचाया है मुझे आँख वाला हो तो इस खेल में अंधा हो जाए मैं भी क़तरा हूँ तिरी बात समझ सकता हूँ ये कि मिट जाने के डर से कोई दरिया हो जाए बस इसी बात पे आईनों से बिगड़ी मेरी चाहता था मिरा अपना कोई चेहरा हो जाए बज़्म-ए-याराँ में यही रंग तो देते हैं मज़ा कोई रोए तो हँसी से कोई दोहरा हो जाए

Shariq Kaifi

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सियाने थे मगर इतने नहीं हम ख़मोशी की ज़बाँ समझे नहीं हम अना की बात अब सुनना पड़ेगी वो क्या सोचेगा जो रूठे नहीं हम अधूरी लग रही है जीत उस को उसे हारे हुए लगते नहीं हम हमें तो रोक लो उठने से पहले पलट कर देखने वाले नहीं हम बिछड़ने का तिरे सदमा तो होगा मगर इस ख़ौफ़ को जीते नहीं हम तिरे रहते तो क्या होते किसी के तुझे खो कर भी दुनिया के नहीं हम ये मंज़िल ख़्वाब ही रहती हमेशा अगर घर लौट कर आते नहीं हम कभी सोचे तो इस पहलू से कोई किसी की बात क्यूँँ सुनते नहीं हम अभी तक मश्वरों पर जी रहे हैं किसी सूरत बड़े होते नहीं हम

Shariq Kaifi

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