ashkon ko arzu-e-rihai hai roiye ankhon ki ab isi men bhalai hai roiye rona ilaj-e-zulmat-e-duniya nahin to kya kam-az-kam ehtijaj-e-khudai hai roiye taslim kar liya hai jo khud ko charaghh-e-haq duniya qadam qadam pe sabai hai roiye khush hain to phir musafir-e-duniya nahin hain aap is dasht men bas abla-pai hai roiye ham hain asir-e-zabt ijazat nahin hamen ro pa rahe hain aap badhai hai roiye ashkon ko aarzu-e-rihai hai roiye aankhon ki ab isi mein bhalai hai roiye rona ilaj-e-zulmat-e-duniya nahin to kya kam-az-kam ehtijaj-e-khudai hai roiye taslim kar liya hai jo khud ko charagh-e-haq duniya qadam qadam pe sabai hai roiye khush hain to phir musafir-e-duniya nahin hain aap is dasht mein bas aabla-pai hai roiye hum hain asir-e-zabt ijazat nahin hamein ro pa rahe hain aap badhai hai roiye
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरी परछाइयाँ गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियाँ घमासान बाक़ी है अभी इस जिस्म-ए-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से अयाँ हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिस की बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमाया-कारी है नफ़ा'-नुक़सान बाक़ी है अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िन्दगी बनकर फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार ज़िंदा हैं हमारी तर्बियत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है
Abbas Qamar
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हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं अगर होते भी हैं बे-इंतिहा दुश्वार होते हैं ख़मोशी कह रही है अब ये दो-आबा रवाँ होगा हवा चुप हो तो बारिश के शदीद आसार होते हैं ज़रा सी बात है इस का तमाशा क्या बनाएँ हम इरादे टूटते हैं हौसले मिस्मार होते हैं शिकायत ज़िंदगी से क्यूँँ करें हम ख़ुद ही थम जाएँ जो कम-रफ़्तार होते हैं वो कम-रफ़्तार होते हैं गले में ज़िंदगी के रीसमान-ए-वक़्त है तो क्या परिंदे क़ैद में हों तो बहुत हुश्यार होते हैं जहाँ वाले मुक़य्यद हैं अभी तक अहद-ए-तिफ़्ली में यहाँ अब भी खिलौने रौनक़-ए-बाज़ार होते हैं गुलू-ए-ख़ुश्क उन को भेजता है दे के मश्कीज़ा कुछ आँसू तिश्ना-कामों के अलम-बरदार होते हैं बदन उन को कभी बाहर निकलने ही नहीं देता 'क़मर-अब्बास' तो बा-क़ाएदा तय्यार होते हैं
Abbas Qamar
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उस की पेशानी पे जो बल आए दो-जहाँ में उथल-पुथल आए ख़्वाब का बोझ इतना भारी था नींद पलकों पे हम कुचल आए इस क़दर जज़्ब हो गए दोनों दर्द खेंचूँ तो दिल निकल आए रूह का नंगापन छिपाने को जिस्म कपड़े बदल बदल आए जिस पे हर चीज़ टाल रक्खी है जाने किस रोज़ मेरा कल आए गुलमोहर की तलाश थी मुझ को मेरे हिस्से मगर कँवल आए
Abbas Qamar
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हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है ख़ुद को माज़ी का निहाँ-ख़ाना बना रक्खा है ख़ौफ़-ए-दोज़ख़ ने ही ईजाद किया है सज्दा डर ने इंसान को दीवाना बना रक्खा है मिम्बर-ए-इश्क़ से तक़रीर की ख़्वाहिश है हमें दिल को इस वास्ते मौलाना बना रक्खा है मातम-ए-शौक़ बपा करते हैं हर शाम यहाँ जिस्म को हम ने अज़ाँ-ख़ाना बना रक्खा है वक़्त-ए-रुख़्सत है मिरे चाहने वालों ने भी अब साँस को वक़्त का पैमाना बना रक्खा है जानते हैं वो परिंदा है नहीं ठहरेगा हम ने उस दिल को मगर दाना बना रक्खा है
Abbas Qamar
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तेरी आग़ोश में सर रक्खा सिसक कर रोए मेरे सपने मेरी आँखों से छलक कर रोए सारी ख़ुशियों को सरे आम झटक कर रोए हम भी बच्चों की तरह पाँव पटक कर रोए रास्ता साफ़ था मंज़िल भी बहुत दूर न थी बीच रस्ते में मगर पाँव अटक कर रोए जिस घड़ी क़त्ल हवाओं ने चराग़ों का किया मेरे हमराह जो जुगनू थे फफक कर रोए क़ीमती ज़िद थी ग़रीबी भी भला क्या करती माँ के जज़्बात दुलारों को थपक कर रोए अपने हालात बयाँ कर के जो रोई धरती चाँद तारे किसी कोने में दुबक कर रोए बा-मशक्कत भी मुकम्मल न हुई अपनी ग़ज़ल चंद नुक्ते मेरे काग़ज़ से सरक कर रोए
Abbas Qamar
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