hava sanke to kharon ko badi taklif hoti hai mire ghham ki baharon ko badi taklif hoti hai na chhed ai ham-nashin ab ziist ke mayus naghhmon ko ki ab barbat ke taron ko badi taklif hoti hai mujhe ai kasrat-e-alam bas itni shikayat hai ki mere ghham-gusaron ko badi taklif hoti hai kaho maujon se lahra kar na yuun palten samundar se ki ba-ghhairat kinaron ko badi taklif hoti hai gale milte hain jab aapas men do bichhde hue sathi 'adam' ham be-saharon ko badi taklif hoti hai hawa sanke to kharon ko badi taklif hoti hai mere gham ki bahaaron ko badi taklif hoti hai na chhed ai ham-nashin ab zist ke mayus naghmon ko ki ab barbat ke taron ko badi taklif hoti hai mujhe ai kasrat-e-alam bas itni shikayat hai ki mere gham-gusaron ko badi taklif hoti hai kaho maujon se lahra kar na yun palten samundar se ki ba-ghairat kinaron ko badi taklif hoti hai gale milte hain jab aapas mein do bichhde hue sathi 'adam' hum be-sahaaron ko badi taklif hoti hai
Related Ghazal
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना गुफ़्तुगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना ज़ुल्म और सब्र का ये खेल मुकम्मल हो जाए उस को ख़ंजर जो दिया है मुझे सर भी देना
Meraj Faizabadi
23 likes
वो हँस के देखती होती तो उस सेे बात करते कोई उम्मीद भी होती तो उस सेे बात करते हम स्टेशन से बाहर आए इस अफ़सोस के साथ वो लड़की अजनबी होती तो उस सेे बात करते हमारे जाम आधी हौसला-अफ़ज़ाई कर पाए अगर उस ने भी पी होती तो उस सेे बात करते हम उस के झुमकों की लरज़िश पे अक्सर सोचते हैं हवा से दोस्ती होती तो उस सेे बात करते ये ख़ामोशी भी क्या है गुफ़्तगू की इंतेहा है कोई बात अनकही होती तो उस सेे बात करते तवज्जोह से बहुत शर्माती है आवाज़ अपनी अगर वो सो रही होती तो उस सेे बात करते किसी से बात करना इतना मुश्किल भी नहीं था किसी ने बात की होती तो उस सेे बात करते
Charagh Sharma
26 likes
मुझे पहले तो लगता था कि ज़ाती मसअला है मैं फिर समझा मोहब्बत काएनाती मसअला है परिंदे क़ैद हैं तुम चहचहाहट चाहते हो तुम्हें तो अच्छा-ख़ासा नफ़सियाती मसअला है हमें थोड़ा जुनूँ दरकार है थोड़ा सुकूँ भी हमारी नस्ल में इक जीनियाती मसअला है बड़ी मुश्किल है बनते सिलसिलों में ये तवक़्क़ुफ़ हमारे राब्तों की बे-सबाती मसअला है वो कहते हैं कि जो होगा वो आगे जा के होगा तो ये दुनिया भी कोई तजरबाती मसअला है हमारा वस्ल भी था इत्तिफ़ाक़ी मसअला था हमारा हिज्र भी है हादसाती मसअला है
Umair Najmi
18 likes
दर्द-ए-दिल की दवा नहीं होती इश्क़ में इल्तिजा नहीं होती बना देने से डर जहन्नुम का बंदगी या ख़ुदा नहीं होती ज़िन्दगी बे-वफ़ा ही होती है मौत पर बे-वफ़ा नहीं होती कुछ तो गुज़री है तेरे दिल पे 'शाद' शा'इरी बेवजह नहीं होती
Shaad Imran
19 likes
More from Abdul Hamid Adam
जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं क्यूँँ शिकन डालते हो माथे पर भूल कर आ गए हैं जाते हैं कश्तियाँ यूँँ भी डूब जाती हैं नाख़ुदा किस लिए डराते हैं इक हसीं आँख के इशारे पर क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं
Abdul Hamid Adam
5 likes
हँस के बोला करो बुलाया करो आप का घर है आया जाया करो मुस्कुराहट है हुस्न का ज़ेवर मुस्कुराना न भूल जाया करो हद से बढ़ कर हसीन लगते हो झूटी क़स्में ज़रूर खाया करो ताकि दुनिया की दिलकशी न घटे नित-नए पैरहन में आया करो कितने सादा-मिज़ाज हो तुम 'अदम' उस गली में बहुत न जाया करो
Abdul Hamid Adam
16 likes
हँस हँस के जाम जाम को छलका के पी गया वो ख़ुद पिला रहे थे मैं लहरा के पी गया तौबा के टूटने का भी कुछ कुछ मलाल था थम थम के सोच सोच के शर्मा के पी गया साग़र-ब-दस्त बैठी रही मेरी आरज़ू साक़ी शफ़क़ से जाम को टकरा के पी गया वो दुश्मनों के तंज़ को ठुकरा के पी गए मैं दोस्तों के ग़ैज़ को भड़का के पी गया सदहा मुतालिबात के बा'द एक जाम-ए-तल्ख़ दुनिया-ए-जब्र-ओ-सब्र को धड़का के पी गया सौ बार लग़्ज़िशों की क़सम खा के छोड़ दी सौ बार छोड़ने की क़सम खा के पी गया पीता कहाँ था सुब्ह-ए-अज़ल मैं भला 'अदम' साक़ी के ए'तिबार पे लहरा के पी गया
Abdul Hamid Adam
6 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Abdul Hamid Adam.
Similar Moods
More moods that pair well with Abdul Hamid Adam's ghazal.







