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hazaron lakhon dilli men makan hain magar pahchanne vaale kahan hain kahin par silsila hai kothiyon ka kahin girte khandar hain naliyan hain kahin hansti chamakti suraten hain kahin mitti hui parchhaiyan hain kahin avaz ke parde pade hain kahin chup men kai sargoshiyan hain qutub-sahib khade hain sar jhukae qile par gidh bahut hi shadman hain are ye kaun si sadken hain bhaai yahan to ladkiyan hi ladkiyan hain likha milta hai divaron pe ab bhi to kya ab bhi vahi bimariyan hain havalon par havale de rahe hain ye sahab to kitabon ki dukan hain mire aage mujhi ko koste hain magar kya kijiye ahl-e-zaban hain dikhaya ek hi dilli ne kya kya bura ho ab to do do dilliyan hain yahan bhi dost mil jaate hain 'alvi' yahan bhi doston men talkhiyan hain hazaron lakhon dilli mein makan hain magar pahchanne wale kahan hain kahin par silsila hai kothiyon ka kahin girte khandar hain naliyan hain kahin hansti chamakti suraten hain kahin mitti hui parchhaiyan hain kahin aawaz ke parde pade hain kahin chup mein kai sargoshiyan hain qutub-sahib khade hain sar jhukae qile par gidh bahut hi shadman hain are ye kaun si sadken hain bhai yahan to ladkiyan hi ladkiyan hain likha milta hai diwaron pe ab bhi to kya ab bhi wahi bimariyan hain hawalon par hawale de rahe hain ye sahab to kitabon ki dukan hain mere aage mujhi ko koste hain magar kya kijiye ahl-e-zaban hain dikhaya ek hi dilli ne kya kya bura ho ab to do do dilliyan hain yahan bhi dost mil jate hain 'alwi' yahan bhi doston mein talkhiyan hain

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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धूप ने गुज़ारिश की एक बूँद बारिश की लो गले पड़े काँटे क्यूँँ गुलों की ख़्वाहिश की जगमगा उठे तारे बात थी नुमाइश की इक पतिंगा उजरत थी छिपकिली की जुम्बिश की हम तवक़्क़ो' रखते हैं और वो भी बख़्शिश की लुत्फ़ आ गया 'अल्वी' वाह ख़ूब कोशिश की

Mohammad Alvi

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दिन इक के बा'द एक गुज़रते हुए भी देख इक दिन तू अपने आप को मरते हुए भी देख हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख हाँ देख बर्फ़ गिरती हुई बाल बाल पर तपते हुए ख़याल ठिठुरते हुए भी देख अपनों में रह के किस लिए सहमा हुआ है तू आ मुझ को दुश्मनों से न डरते हुए भी देख पैवंद बादलों के लगे देख जा-ब-जा बगलों को आसमान कतरते हुए भी देख हैरान मत हो तैरती मछली को देख कर पानी में रौशनी को उतरते हुए भी देख उस को ख़बर नहीं है अभी अपने हुस्न की आईना दे के बनते-सँवरते हुए भी देख देखा न होगा तू ने मगर इंतिज़ार में चलते हुए समय को ठहरते हुए भी देख ता'रीफ़ सुन के दोस्त से 'अल्वी' तू ख़ुश न हो उस को तिरी बुराइयाँ करते हुए भी देख

Mohammad Alvi

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