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insani darinde aur is asani se mar jaaen ye sochne baithen to pareshani se mar jaaen vo jin ko mayassar thi har ik chiz-e-digar bhi mumkin hai suhulat ki faravani se mar jaaen kashti pe the kashti ko jalate hue hazrat ab aag se bach jaaen bhale paani se mar jaaen aine ka ye kaun sa session hai hamen kya divar ko takte hue hairani se mar jaaen 'babar' koi jazbati kronon se ye puchhe kis khate men ham aap ki nadani se mar jaaen ai dost mukammal nazar-andaz hi kar dekh aisa na ho ham niim nigahbani se mar jaaen bach jaaen to akhir kise kya farq padega dushman na sahi dost pashemani se mar jaaen ankhon men utarte hue itraen sitare suraj hon to jal kar tiri peshani se mar jaaen ranjhe ko to phir hiir ki tasvir bahut hai ji karta tha lag kar usi marjani se mar jaaen insani darinde aur is aasani se mar jaen ye sochne baithen to pareshani se mar jaen wo jin ko mayassar thi har ek chiz-e-digar bhi mumkin hai suhulat ki farawani se mar jaen kashti pe the kashti ko jalate hue hazraat ab aag se bach jaen bhale pani se mar jaen aaine ka ye kaun sa session hai hamein kya diwar ko takte hue hairani se mar jaen 'babar' koi jazbaati kronon se ye puchhe kis khate mein hum aap ki nadani se mar jaen ai dost mukammal nazar-andaz hi kar dekh aisa na ho hum nim nigahbani se mar jaen bach jaen to aakhir kise kya farq padega dushman na sahi dost pashemani se mar jaen aankhon mein utarte hue itraen sitare suraj hon to jal kar teri peshani se mar jaen ranjhe ko to phir hir ki taswir bahut hai ji karta tha lag kar usi marjaani se mar jaen

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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तिरी गली से गुज़रने को सर झुकाए हुए फ़क़ीर हुजरा-ए-हफ़्त-आसमाँ उठाए हुए कोई दरख़्त सराए कि जिस में जा बैठें परिंदे अपनी परेशानियाँ भुलाए हुए मिरे सवाल वही टूट-फूट की ज़द में जवाब उन के वही हैं बने-बनाए हुए हमें जो देखते थे जिन को देखते थे हम वो ख़्वाब ख़ाक हुए और वो लोग साए हुए शिकारियों से मिरे एहतिजाज में 'बाबर' दरख़्त आज भी शामिल थे हाथ उठाए हुए

Idris Babar

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अब मसाफ़त में तो आराम नहीं आ सकता ये सितारा भी मिरे काम नहीं आ सकता ये मिरी सल्तनत-ए-ख़्वाब है आबाद रहो इस के अंदर कोई बहराम नहीं आ सकता जाने खिलते हुए फूलों को ख़बर है कि नहीं बाग़ में कोई सियह-फ़ाम नहीं आ सकता हर हवा-ख़्वाह ये कहता था कि महफ़ूज़ हूँ मैं बुझने वालों में मिरा नाम नहीं आ सकता मैं जिन्हें याद हूँ अब तक यही कहते होंगे शाहज़ादा कभी नाकाम नहीं आ सकता डर ही लगता है कि रस्ते में न रह जाऊँ कहीं कहलवा दीजिए में शाम नहीं आ सकता

Idris Babar

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एक दिन ख़्वाब-नगर जाना है और यूँँही ख़ाक-बसर जाना है उम्र भर की ये जो है बे-ख़्वाबी ये उसी ख़्वाब का हर्जाना है घर से किस वक़्त चले थे हम लोग ख़ैर अब कौन सा घर जाना है मौत की पहली अलामत साहिब यही एहसास का मर जाना है किसी तक़रीब-ए-जुदाई के बग़ैर ठीक है जाओ अगर जाना है शोर की धूल में गुम गलियों से दिल को चुप-चाप गुज़र जाना है

Idris Babar

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वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा सो दिल ये ख़ाकसार भी नहीं रहा ये दिल तो उस के नाम का पड़ाव है जहाँ वो एक बार भी नहीं रहा पड़ा है ख़ुद से वास्ता और इस के ब'अद किसी का ए'तिबार भी नहीं रहा ये रंज अपनी अस्ल शक्ल में है दोस्त कि मैं इसे सँवार भी नहीं रहा ये वक़्त भी गुज़र नहीं रहा है और मैं ख़ुद इसे गुज़ार भी नहीं रहा

Idris Babar

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देखा नहीं चाँद ने पलट कर हम सो गए ख़्वाब से लिपट कर अब दिल में वो सब कहाँ है देखो बग़दाद कहानियों से हट कर शायद ये शजर वही हो जिस पर देखो तो ज़रा वरक़ उलट कर इक ख़ौफ़-ज़दा सा शख़्स घर तक पहुँचा कई रास्तों में बट कर काग़ज़ पे वो नज़्म खिल उठी है उग आया है फिर दरख़्त कट कर 'बाबर' ये परिंद थक गए थे बैठे हैं जो ख़ाक पर सिमट कर

Idris Babar

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