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'insha'-ji utho ab kuuch karo is shahr men ji ko lagana kya vahshi ko sukun se kya matlab jogi ka nagar men thikana kya is dil ke darida daman ko dekho to sahi socho to sahi jis jholi men sau chhed hue us jholi ka phailana kya shab biiti chand bhi duub chala zanjir padi darvaze men kyuun der gae ghar aae ho sajni se karoge bahana kya phir hijr ki lambi raat miyan sanjog ki to yahi ek ghadi jo dil men hai lab par aane do sharmana kya ghabrana kya us roz jo un ko dekha hai ab khvab ka aalam lagta hai us roz jo un se baat hui vo baat bhi thi afsana kya us husn ke sachche moti ko ham dekh saken par chhu na saken jise dekh saken par chhu na saken vo daulat kya vo khazana kya us ko bhi jala dukhte hue man ik shoala laal bhabuka ban yuun aansu ban bah jaana kya yuun maati men mil jaana kya jab shahr ke log na rasta den kyuun ban men na ja bisram kare divanon ki si na baat kare to aur kare divana kya 'insha'-ji utho ab kuch karo is shahr mein ji ko lagana kya wahshi ko sukun se kya matlab jogi ka nagar mein thikana kya is dil ke darida daman ko dekho to sahi socho to sahi jis jholi mein sau chhed hue us jholi ka phailana kya shab biti chand bhi dub chala zanjir padi darwaze mein kyun der gae ghar aae ho sajni se karoge bahana kya phir hijr ki lambi raat miyan sanjog ki to yahi ek ghadi jo dil mein hai lab par aane do sharmana kya ghabrana kya us roz jo un ko dekha hai ab khwab ka aalam lagta hai us roz jo un se baat hui wo baat bhi thi afsana kya us husn ke sachche moti ko hum dekh saken par chhu na saken jise dekh saken par chhu na saken wo daulat kya wo khazana kya us ko bhi jala dukhte hue man ek shoala lal bhabuka ban yun aansu ban bah jaana kya yun mati mein mil jaana kya jab shahr ke log na rasta den kyun ban mein na ja bisram kare diwanon ki si na baat kare to aur kare diwana kya

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले चल दिए उठ के सू-ए-शहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब पूछ लेना था किसी ख़ाक-बसर से पहले इश्क़ पहले भी किया हिज्र का ग़म भी देखा इतने तड़पे हैं न घबराए न तरसे पहले जी बहलता ही नहीं अब कोई साअ'त कोई पल रात ढलती ही नहीं चार पहरस पहले हम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी सैकड़ों दर थे मिरी जाँ तिरे दर से पहले चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा हम को सौ बार हुई सुब्ह सहरस पहले

Ibn E Insha

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रात के ख़्वाब सुनाएँ किस को रात के ख़्वाब सुहाने थे धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे ज़िद्दी वहशी अल्हड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग होंट उन के ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे वहशत का उनवान हमारी उन में से जो नार बनी देखेंगे तो लोग कहेंगे 'इंशा'-जी दीवाने थे ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी इस से उन को मिलना था तो इस के लाख बहाने थे हम को सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने हम क्यूँँ उन के दर पर उतरे कितने और ठिकाने थे

Ibn E Insha

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और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का सुब्ह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का झूटे सिक्कों में भी उठा देते हैं ये अक्सर सच्चा माल शक्लें देख के सौदे करना काम है इन बंजारों का अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का जिस जिप्सी का ज़िक्र है तुम से दिल को उसी की खोज रही यूँँ तो हमारे शहर में अक्सर मेला लगा निगारों का एक ज़रा सी बात थी जिस का चर्चा पहुँचा गली गली हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का दर्द का कहना चीख़ ही उठो दिल का कहना वज़्अ'' निभाओ सब कुछ सहना चुप चुप रहना काम है इज़्ज़त-दारों का 'इंशा' जी अब अजनबियों में चैन से बाक़ी उम्र कटे जिन की ख़ातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का

Ibn E Insha

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हम उन से अगर मिल बैठे हैं क्या दोश हमारा होता है कुछ अपनी जसारत होती है कुछ उन का इशारा होता है कटने लगीं रातें आँखों में देखा नहीं पलकों पर अक्सर या शाम-ए-ग़रीबाँ का जुगनू या सुब्ह का तारा होता है हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके ऐ बंजारो हम लोग चले हम को तो ख़सारा होता है दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए कुछ शे'र कहे कुछ कॉफ़ी पी पूछो जो मआश का 'इंशा'-जी यूँँ अपना गुज़ारा होता है

Ibn E Insha

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दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो इस बात से हम को क्या मतलब ये कैसे हो ये क्यूँँकर हो इक भीक के दोनों कासे हैं इक प्यास के दोनो प्यासे हैं हम खेती हैं तुम बादल हो हम नदियाँ हैं तुम सागर हो ये दिल है कि जलते सीने में इक दर्द का फोड़ा अल्हड़ सा ना गुप्त रहे ना फूट बहे कोई मरहम हो कोई निश्तर हो हम साँझ समय की छाया हैं तुम चढ़ती रात के चंद्रमाँ हम जाते हैं तुम आते हो फिर मेल की सूरत क्यूँँकर हो अब हुस्न का रुत्बा आली है अब हुस्न से सहरा ख़ाली है चल बस्ती में बंजारा बन चल नगरी में सौदागर हो जिस चीज़ से तुझ को निस्बत है जिस चीज़ की तुझ को चाहत है वो सोना है वो हीरा है वो माटी हो या कंकर हो अब 'इंशा'-जी को बुलाना क्या अब प्यार के दीप जलाना क्या जब धूप और छाया एक से हों जब दिन और रात बराबर हो वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर हो

Ibn E Insha

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