ghazalKuch Alfaaz

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की आज पहली बार उस से मैं ने बे-वफ़ाई की वर्ना अब तलक यूँँ था ख़्वाहिशों की बारिश में या तो टूट कर रोया या ग़ज़ल-सराई की तज दिया था कल जिन को हम ने तेरी चाहत में आज उन से मजबूरन ताज़ा आशनाई की हो चला था जब मुझ को इख़्तिलाफ़ अपने से तू ने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हम-नवाई की तर्क कर चुके क़ासिद कू-ए-ना-मुरादाँ को कौन अब ख़बर लावे शहर-ए-आश्नाई की तंज़ ओ ता'ना ओ तोहमत सब हुनर हैं नासेह के आप से कोई पूछे हम ने क्या बुराई की फिर क़फ़स में शोर उट्ठा क़ैदियों का और सय्याद देखना उड़ा देगा फिर ख़बर रिहाई की दुख हुआ जब उस दर पर कल 'फ़राज़' को देखा लाख ऐब थे उस में ख़ू न थी गदाई की

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे अपने अफ़्कार जला डालेंगे काग़ज़ काग़ज़ सोच मर जाएगी तो हम आप भी मर जाएँगे इस सेे पहले कि जुदाई की ख़बर तुम सेे मिले हम ने सोचा है कि हम तुम सेे बिछड़ जाएँगे

Khalil Ur Rehman Qamar

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मैं कब तन्हा हुआ था याद होगा तुम्हारा फ़ैसला था याद होगा बहुत से उजले उजले फूल ले कर कोई तुम से मिला था याद होगा बिछी थीं हर तरफ़ आँखें ही आँखें कोई आँसू गिरा था याद होगा उदासी और बढ़ती जा रही थी वो चेहरा बुझ रहा था याद होगा वो ख़त पागल हवा के आँचलों पर किसे तुम ने लिखा था याद होगा

Bashir Badr

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एक तस्वीर कि अव्वल नहीं देखी जाती देख भी लूँ तो मुसलसल नहीं देखी जाती देखी जाती है मोहब्बत में हर जुम्बिश-ए-दिल सिर्फ़ साँसों की रिहर्सल नहीं देखी जाती इक तो वैसे बड़ी तारीक है ख़्वाहिश नगरी फिर तवील इतनी कि पैदल नहीं देखी जाती ऐसा कुछ है भी नहीं जिस सेे तुझे बहलाऊँ ये उदासी भी मुसलसल नहीं देखी जाती मैं ने इक उम्र से बटुए में सँभाली हुई है वही तस्वीर जो इक पल नहीं देखी जाती अब मेरा ध्यान कहीं और चला जाता है अब कोई फ़िल्म मुकम्मल नहीं देखी जाती

Jawwad Sheikh

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परिंदे सह में सह में उड़ रहे हैं बराबर में फ़रिश्ते उड़ रहे हैं ख़ुशी से कब ये तिनके उड़ रहे हैं हवा के डर के मारे उड़ रहे हैं कहीं कोई कमाँ ता'ने हुए है कबूतर आड़े-तिरछे उड़ रहे हैं तुम्हारा ख़त हवा में उड़ रहा है तआ'क़ुब में लिफ़ाफ़े उड़ रहे हैं बहुत कहती रही आँधी से चिड़िया कि पहली बार बच्चे उड़ रहे हैं शजर के सब्ज़ पत्तों की हवा से फ़ज़ा में ख़ुश्क पत्ते उड़ रहे हैं

Fahmi Badayuni

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क्यूँँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं दोस्ती तो उदास करती नहीं हम हमेशा के सैर-चश्म सही तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन! इतनी आसानियों से मरती नहीं जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़ ज़िन्दगी उस तरह गुज़रती नहीं

Ahmad Faraz

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दिल बदन का शरीक-ए-हाल कहाँ हिज्र फिर हिज्र है विसाल कहाँ इश्क़ है नाम इंतिहाओं का इस समुंदर में एतिदाल कहाँ ऐसा नशातो ज़हर में भी न था ऐ ग़म-ए-दिल तिरी मिसाल कहाँ हम को भी अपनी पाएमाली का है मगर इस क़दर मलाल कहा मैं नई दोस्ती के मोड़ पे था आ गया है तिरा ख़याल कहा दिल कि ख़ुश-फ़हम था सो है वर्ना तेरे मिलने का एहतिमाल कहाँ वस्ल ओ हिज्रांहैं और दुनियाएं इन ज़मानों में माह-ओ-साल कहाँ तुझ को देखा तो लोग हैरांहैं आ गया शहर में ग़ज़ाल कहाँ तुझ पे लिक्खी तो सज गई है ग़ज़ल आ मिला ख़्वाब से ख़याल कहाँ अब तो शह मात हो रही है 'फ़राज़' अब बचाव की कोई चाल कहाँ

Ahmad Faraz

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जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए कि हम से दोस्त बहुत बे-ख़बर हमारे हुए किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी बहुत से लोग तुझे देख कर हमारे हुए अब इक हुजूम-ए-शिकस्ता-दिलाँ है साथ अपने जिन्हें कोई न मिला हम-सफ़र हमारे हुए किसी ने ग़म तो किसी ने मिज़ाज-ए-ग़म बख़्शा सब अपनी अपनी जगह चारा-गर हमारे हुए बुझा के ताक़ की शमएँ न देख तारों को इसी जुनूँ में तो बर्बाद घर हमारे हुए वो ए'तिमाद कहाँ से 'फ़राज़' लाएँगे किसी को छोड़ के वो अब अगर हमारे हुए

Ahmad Faraz

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यूँँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ ज़िंदगी हम तिरे हाथों से न मारे जाएँ अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ वो जो मौजूद नहीं उस की मदद चाहते हैं वो जो सुनता ही नहीं उस को पुकारे जाएँ बाप लर्ज़ां है कि पहुँची नहीं बारात अब तक और हम-जोलियाँ दुल्हन को सँवारे जाएँ हम कि नादान जुआरी हैं सभी जानते हैं दिल की बाज़ी हो तो जी जान से हारे जाएँ तज दिया तुम ने दर-ए-यार भी उकता के 'फ़राज़' अब कहाँ ढूँढ़ने ग़म-ख़्वार तुम्हारे जाएँ

Ahmad Faraz

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जब भी दिल खोल के रोए होंगे लोग आराम से सोए होंगे बाज़ औक़ात ब-मजबूरी-ए-दिल हम तो क्या आप भी रोए होंगे सुब्ह तक दस्त-ए-सबा ने क्या क्या फूल काँटों में पिरोए होंगे वो सफ़ीने जिन्हें तूफ़ाँ न मिले ना-ख़ुदाओं ने डुबोए होंगे रात भर हँसते हुए तारों ने उन के आरिज़ भी भिगोए होंगे क्या अजब है वो मिले भी हों 'फ़राज़' हम किसी ध्यान में खोए होंगे

Ahmad Faraz

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