kaha takhliq-e-fan bole bahut dushvar to hogi kaha makhluq bole bais-e-azar to hogi kaha: ham kya karen is ahd-e-na-pursan men kuchh kahiye vo bole koi akhir surat-e-izhar to hogi kaha: ham apni marzi se safar bhi kar nahin sakte vo bole har qadam par ik nai divar to hogi kaha: ankhen nahin is ghham men binai bhi jaati hai vo bole hijr ki shab hai zara dushvar to hogi kaha: jalta hai dil bole ise jalne diya jaae andhere men kisi ko raushni darkar to hogi kaha: ye kucha-gardi aur kitni der tak akhir vo bole ishq men mitti tumhari khvar to hogi kaha takhliq-e-fan bole bahut dushwar to hogi kaha makhluq bole bais-e-azar to hogi kaha: hum kya karen is ahd-e-na-pursan mein kuchh kahiye wo bole koi aakhir surat-e-izhaar to hogi kaha: hum apni marzi se safar bhi kar nahin sakte wo bole har qadam par ek nai diwar to hogi kaha: aankhen nahin is gham mein binai bhi jati hai wo bole hijr ki shab hai zara dushwar to hogi kaha: jalta hai dil bole ise jalne diya jae andhere mein kisi ko raushni darkar to hogi kaha: ye kucha-gardi aur kitni der tak aakhir wo bole ishq mein mitti tumhaari khwar to hogi
Related Ghazal
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
435 likes
वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
244 likes
More from Aitbar Sajid
छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ लोग ज़िंदा हैं अजब सूरत-ए-हालात के साथ फ़ैसला ये तो बहर-हाल तुझे करना है ज़ेहन के साथ सुलगना है कि जज़्बात के साथ गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ अब के ये सोच के तुम ज़ख़्म-ए-जुदाई देना दिल भी बुझ जाएगा ढलती हुई इस रात के साथ तुम वही हो कि जो पहले थे मिरी नज़रों में क्या इज़ाफ़ा हुआ इन अतलस ओ बानात के साथ इतना पसपा न हो दीवार से लग जाएगा इतने समझौते न कर सूरत-ए-हालात के साथ भेजता रहता है गुम-नाम ख़तों में कुछ फूल इस क़दर किस को मोहब्बत है मिरी ज़ात के साथ
Aitbar Sajid
0 likes
घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना तुम किसी चश्म-ए-ख़रीदार में मत आ जाना ख़ाक उड़ाना इन्हीं गलियों में भला लगता है चलते फिरते किसी दरबार में मत आ जाना यूँँही ख़ुशबू की तरह फैलते रहना हर सू तुम किसी दाम-ए-तलबगार में मत आ जाना दूर साहिल पे खड़े रह के तमाशा करना किसी उम्मीद के मँझधार में मत आ जाना अच्छे लगते हो कि ख़ुद-सर नहीं ख़ुद्दार हो तुम हाँ सिमट के बुत-ए-पिंदार में मत आ जाना चाँद कहता हूँ तो मतलब न ग़लत लेना तुम रात को रौज़न-ए-दीवार में मत आ जाना
Aitbar Sajid
1 likes
मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है इसी पर सोचते रहने की फ़ुर्सत कौन रखता है मकीनों के तअल्लुक़ ही से याद आती है हर बस्ती वगरना सिर्फ़ बाम-ओ-दर से उल्फ़त कौन रखता है नहीं है निर्ख़ कोई मेरे इन अशआर-ए-ताज़ा का ये मेरे ख़्वाब हैं ख़्वाबों की क़ीमत कौन रखता है दर-ए-ख़ेमा खुला रक्खा है गुल कर के दिया हम ने सो इज़्न-ए-आम है लो शौक़-रुख़्सत कौन रखता है मरे दुश्मन का क़द इस भीड़ में मुझ से तो ऊँचा हो यही में ढूँढ़ता हूँ ऐसी क़ामत कौन रखता है हमारे शहर की रौनक़ है कुछ मशहूर लोगों से मगर सब जानते हैं कैसी शोहरत कौन रखता है
Aitbar Sajid
0 likes
तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो
Aitbar Sajid
1 likes
जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जो मोहब्बतों की असास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जिन्हें मानता ही नहीं ये दिल वही लोग मेरे हैं हम-सफ़र मुझे हर तरह से जो रास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए मुझे लम्हा-भर की रफ़ाक़तों के सराब और सताएँगे मिरी उम्र-भर की जो प्यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए ये ख़याल सारे हैं आरज़ी ये गुलाब सारे हैं काग़ज़ी गुल-ए-आरज़ू की जो बास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जिन्हें कर सका न क़ुबूल मैं वो शरीक-ए-राह-ए-सफ़र हुए जो मिरी तलब मिरी आस थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए मिरी धड़कनों के क़रीब थे मिरी चाह थे मिरा ख़्वाब थे वो जो रोज़-ओ-शब मिरे पास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
Aitbar Sajid
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Aitbar Sajid.
Similar Moods
More moods that pair well with Aitbar Sajid's ghazal.







