kahin log tanha kahin ghar akele kahan tak main dekhun ye manzar akele gali men havaon ki sargoshiyan hain gharon men magar sab sanobar akele numaish hazaron nigahon ne dekhi magar phuul pahle se badh kar akele ab ik tiir bhi ho liya saath varna parinda chala tha safar par akele jo dekho to ik lahr men ja rahe hain jo socho to saare shanavar akele tiri yaad ki barf-bari ka mausam sulagta raha dil ke andar akele irada tha ji lunga tujh se bichhad kar guzarta nahin ik december akele zamane se 'qasir' khafa to nahin hain ki dekhe gae hain vo aksar akele kahin log tanha kahin ghar akele kahan tak main dekhun ye manzar akele gali mein hawaon ki sargoshiyan hain gharon mein magar sab sanobar akele numaish hazaron nigahon ne dekhi magar phul pahle se badh kar akele ab ek tir bhi ho liya sath warna parinda chala tha safar par akele jo dekho to ek lahr mein ja rahe hain jo socho to sare shanawar akele teri yaad ki barf-bari ka mausam sulagta raha dil ke andar akele irada tha ji lunga tujh se bichhad kar guzarta nahin ek december akele zamane se 'qasir' khafa to nahin hain ki dekhe gae hain wo aksar akele
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है
Tehzeeb Hafi
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बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है ज़िंदगी से ये मिरा दूसरा समझौता है लहलहाते हुए ख़्वाबों से मिरी आँखों तक रतजगे काश्त न कर ले तो वो कब सोता है जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँँ बोता है नाम लिख लिख के तिरा फूल बनाने वाला आज फिर शबनमीं आँखों से वरक़ धोता है तेरे बख़्शे हुए इक ग़म का करिश्मा है कि अब जो भी ग़म हो मिरे मेआ'र से कम होता है सो गए शहर-ए-मोहब्बत के सभी दाग़ ओ चराग़ एक साया पस-ए-दीवार अभी रोता है ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है
Ghulam Mohammad Qasir
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पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना और फिर पूरी काएनात बना हुस्न ने ख़ुद कहा मुसव्विर से पाँव पर मेरे कोई हाथ बना प्यास की सल्तनत नहीं मिटती लाख दजले बना फ़ुरात बना ग़म का सूरज वो दे गया तुझ को चाहे अब दिन बना कि रात बना शे'र इक मश्ग़ला था 'क़ासिर' का अब यही मक़्सद-ए-हयात बना
Ghulam Mohammad Qasir
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अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है मैं जिस पल से गुज़रता हूँ मोहब्बत साथ होती है तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है सरों पर ख़ौफ़-ए-रुस्वाई की चादर तान लेते हो तुम्हारे वास्ते रंगों की जब बरसात होती है कहीं चिड़ियाँ चहकती हैं कहीं कलियाँ चटकती हैं मगर मेरे मकाँ से आसमाँ तक रात होती है किसे आबाद समझूँ किस का शहर-आशोब लिखूँ मैं जहाँ शहरों की यकसाँ सूरत-ए-हालात होती है
Ghulam Mohammad Qasir
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कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले कहाँ तक मैं देखूँ ये मंज़र अकेले गली में हवाओं की सरगोशियाँ हैं घरों में मगर सब सनोबर अकेले नुमाइश हज़ारों निगाहों ने देखी मगर फूल पहले से बढ़ कर अकेले अब इक तीर भी हो लिया साथ वर्ना परिंदा चला था सफ़र पर अकेले जो देखो तो इक लहर में जा रहे हैं जो सोचो तो सारे शनावर अकेले तिरी याद की बर्फ़-बारी का मौसम सुलगता रहा दिल के अंदर अकेले इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर गुज़रता नहीं इक दिसम्बर अकेले ज़माने से 'क़ासिर' ख़फ़ा तो नहीं हैं कि देखे गए हैं वो अक्सर अकेले
Ghulam Mohammad Qasir
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बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता वो शख़्स जिस का मुझे नाम भी नहीं आता उसी की शक्ल मुझे चाँद में नज़र आए वो माह-रुख़ जो लब-ए-बाम भी नहीं आता करूँँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता बिठा दिया मुझे दरिया के उस किनारे पर जिधर हुबाब तही-जाम भी नहीं आता चुरा के ख़्वाब वो आँखों को रेहन रखता है और उस के सर कोई इल्ज़ाम भी नहीं आता
Ghulam Mohammad Qasir
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