khvab ankhon ko hamari jo dikhae aaina khuun ke aansu vahi ham ko rulae aaina aadmi ki fitraten jaise samajhta ho sabhi aadmi ke saath aise muskurae aaina bantana to chahta hai dukh buzurgon ke magar jhurriyon ko kis tarah un ki chhupae aaina aaine ke samne se koi to hatta nahin aur kisi ko khvab tak ye darae aaina ghham nahin be-shak bikhar jaae kisi din tuut kar jhuut ke aage na sar hargiz jhukae aaina bol kar sach kaun kitne din salamat rah saka dar ke saae men hayat apni bitae aaina vaqt chehre par jab us ke likh gaya nakamiyan kaise vo divar par 'kalkal' sajae aaina khwab aankhon ko hamari jo dikhae aaina khun ke aansu wahi hum ko rulae aaina aadmi ki fitraten jaise samajhta ho sabhi aadmi ke sath aise muskurae aaina bantana to chahta hai dukh buzurgon ke magar jhurriyon ko kis tarah un ki chhupae aaina aaine ke samne se koi to hatta nahin aur kisi ko khwab tak ye darae aaina gham nahin be-shak bikhar jae kisi din tut kar jhut ke aage na sar hargiz jhukae aaina bol kar sach kaun kitne din salamat rah saka dar ke sae mein hayat apni bitae aaina waqt chehre par jab us ke likh gaya nakaamiyan kaise wo diwar par 'kalkal' sajae aaina
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इक ज़रा सा टूट कर मिस्मार हो जाता है क्या आईने का आईना बेकार हो जाता है क्या आज कल मायूस वापस आ रहे हैं क़ाफ़िले आज कल उस दर से भी इनकार हो जाता है क्या हाथ पाँव मारने से हो नहीं सकता अगर डूब जाने से समुंदर पार हो जाता है क्या आलम-ए-तन्हाई में भी उस का ऐसा ख़ौफ़ है ज़ेहन में होता है क्या इज़हार हो जाता है क्या हाए उस का इस क़दर मासूमियत से पूछना लड़कियों को लड़कियों से प्यार हो जाता है क्या
Zia Mazkoor
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया जिस को गले लगा लिया वो दूर हो गया काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया महलों में हम ने कितने सितारे सजा दिए लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना! आईना बात करने पे मजबूर हो गया दादी से कहना उस की कहानी सुनाइए जो बादशाह इश्क़ में मज़दूर हो गया सुब्ह-ए-विसाल पूछ रही है अजब सवाल वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया कुछ फल ज़रूर आएँगे रोटी के पेड़ में जिस दिन मिरा मुतालबा मंज़ूर हो गया
Bashir Badr
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हज़ार सहरा थे रस्ते में यार क्या करता जो चल पड़ा था तो फ़िक्र-ए-ग़ुबार क्या करता कभी जो ठीक से ख़ुद को समझ नहीं पाया वो दूसरों पे भला ए'तिबार क्या करता चलो ये माना कि इज़हार भी ज़रूरी है सो एक बार किया, बार बार क्या करता इसी लिए तो दर-ए-आइना भी वा न किया जो सो रहे हैं उन्हें होशियार क्या करता वो अपने ख़्वाब की तफ़्सीर ख़ुद न कर पाया जहान भर पे उसे आश्कार क्या करता अगर वो करने पे आता तो कुछ भी कर जाता ये सोच मत कि अकेला शरार क्या करता सिवाए ये कि वो अपने भी ज़ख़्म ताज़ा करे मिरे ग़मों पे मिरा ग़म-गुसार क्या करता बस एक फूल की ख़ातिर बहार माँगी थी रुतों से वर्ना मैं क़ौल-ओ-क़रार क्या करता मिरा लहू ही कहानी का रंग था 'जव्वाद' कहानी-कार उसे रंग-दार क्या करता
Jawwad Sheikh
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इक परिंदा अभी उड़ान में है तीर हर शख़्स की कमान में है जिस को देखो वही है चुप चुप सा जैसे हर शख़्स इम्तिहान में है खो चुके हम यक़ीन जैसी शय तू अभी तक किसी गुमान में है ज़िंदगी संग-दिल सही लेकिन आईना भी इसी चटान में है सर-बुलंदी नसीब हो कैसे सर-निगूँ है कि साएबान में है ख़ौफ़ ही ख़ौफ़ जागते सोते कोई आसेब इस मकान में है आसरा दिल को इक उमीद का है ये हवा कब से बादबान में है ख़ुद को पाया न उम्र भर हम ने कौन है जो हमारे ध्यान में है
Ameer Qazalbash
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