ghazalKuch Alfaaz

मल्लाहों का ध्यान बटाकर दरिया चोरी कर लेना है, क़तरा क़तरा कर के मैं ने सारा चोरी कर लेना है। तुम उस को मजबूर किए रखना बातें करते रहने पर इतनी देर में मैं ने उस का लहज़ा चोरी कर लेना है। आज तो मैं अपनी तस्वीर को कमरे में ही भूल आया हूँ लेकिन उस ने एक दिन मेरा बटुआ चोरी कर लेना है। मेरे ख़ाक उड़ाने पर पाबन्दी आयत करने वालों मैं ने कौन सा आप के शहर का रास्ता चोरी कर लेना है।

Tehzeeb Hafi29 Likes

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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दर-गुज़र जितना किया है वही काफ़ी है मुझे अब तुझे क़त्ल भी कर दूँ तो मुआ'फ़ी है मुझे मसअला ऐसे कोई हल तो न होगा शायद शे'र कहना ही मिरे ग़म की तलाफ़ी है मुझे दफ़अ'तन इक नए एहसास ने चौंका सा दिया मैं तो समझा था कि हर साँस इज़ाफ़ी है मुझे मैं न कहता था दवाएँ नहीं काम आएँगी जानता था तिरी आवाज़ ही शाफ़ी है मुझे इस से अंदाज़ा लगाओ कि मैं किस हाल में हूँ ग़ैर का ध्यान भी अब वा'दा-ख़िलाफ़ी है मुझे वो कहीं सामने आ जाए तो क्या हो 'जव्वाद' याद ही उस की अगर सीना-शिगाफ़ी है मुझे

Jawwad Sheikh

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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हाँ ये सच है कि मोहब्बत नहीं की दोस्त बस मेरी तबीयत नहीं की इस लिए गांव मैं सैलाब आया हम ने दरियाओ की इज़्ज़त नहीं की जिस्म तक उस ने मुझे सौंप दिया दिल ने इस पर भी कनायत नहीं की मेरे ए'जाज़ में रखी गई थी मैं ने जिस बज़्म में शिरकत नहीं की याद भी याद से रखा उस को भूल जाने में भी गफलत नहीं की उस को देखा था अजब हालत में फिर कभी उस की हिफाज़त नहीं की हम अगर फतह हुए है तो क्या इश्क़ ने किस पे हकूमत नहीं की

Tehzeeb Hafi

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अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था

Tehzeeb Hafi

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अश्क ज़ाएअ'' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानहे गुज़रे पर इन आँखों को क्या मेरा दुख ये है कि मेरा हम-सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मिरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस से था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था

Tehzeeb Hafi

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सहरा से आने वाली हवाओं में रेत है हिजरत करूँँगा गाँव से गाँव में रेत है ऐ क़ैस तेरे दश्त को इतनी दुआएँ दीं कुछ भी नहीं है मेरी दु'आओं में रेत है सहरा से हो के बाग़ में आ हूँ सैर को हाथों में फूल हैं मिरे पाँव में रेत है मुद्दत से मेरी आँख में इक ख़्वास है मुक़ीम पानी में पेड़ पेड़ की छाँव में रेत है मुझ सा कोई फ़क़ीर नहीं है कि जिस के पास कश्कोल रेत का है सदाओं में रेत है

Tehzeeb Hafi

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ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिल-ए-सफ़-ए-आवारगी नहीं लगता कभी कभी तो वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहा से तुझे मौसमी नहीं लगता मैं चाहता हूँ वो मेरी जबीं पे बोसा दे मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता मैं उस के पास किसी काम से नहीं आता उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता

Tehzeeb Hafi

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अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी वो इक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी वो इक चराग़-कदा जिस में कुछ नहीं था मेरा वो जल रही थी वो क़िंदील भी पराई थी न जाने कितने परिंदों ने इस में शिरकत की कल एक पेड़ की तरक़ीब-ए-रू-नुमाई थी हवाओं आओ मिरे गाँव की तरफ़ देखो जहाँ ये रेत है पहले यहाँ तराई थी किसी सिपाह ने ख़े में लगा दिए हैं वहाँ जहाँ ये मैं ने निशानी तिरी दबाई थी गले मिला था कभी दुख भरे दिसम्बर से मिरे वजूद के अंदर भी धुँद छाई थी

Tehzeeb Hafi

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