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मन जिस का मौला होता है वो बिल्कुल मुझ सा होता है आँखें हंस कर पूछ रही हैं नींद आने से क्या होता है मिट्टी की इज़्ज़त होती है पानी का चर्चा होता है जानता हूँ मंसूर को भी मैं अपने ही घर का होता है अच्छी लड़की ज़िद नहीं करते देखो इश्क़ बुरा होता है वहशत का इक गुर है जिस में क़ैस अपना बच्चा होता है बाज़-औक़ात मुझे दुनिया पर दुनिया का भी शुबह होता है तुम मुझ को अपना कहते हो कह लेने से क्या होता है

Ali Zaryoun26 Likes

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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चरागाहें न‌ई आबाद होगी मगर जो बस्तियाँ बर्बाद होगी ख़ुदा मिट्टी को फिर से हुक्म देगा कई शक्लें न‌ई ईजाद होगी अभी मुमकिन नहीं लेकिन ये होगा किताबें साहिब-ए-औलाद होगी मैं उन आँखों को पढ़ कर सोचता हूँ ये नज्में किस तरह से याद होगी ये परियाँ फिर नहीं आएगी मिलने ये ग़ज़लें फिर नहीं इरशाद होगी मैं डरता हूँ अली उन आदतों से के जो मुझ को तुम्हारे बा'द होगी

Ali Zaryoun

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हालत ए हिज्र में हूँ यार मेरी सम्त न देख तू न हो जाए गिरफ्तार, मेरी सम्त न देख आस्तीन में जो छूपे सांप हैं उन को तो निकाल अपने नुक़सान पर हर बार मेरी सम्त न देख तुझ को जिस बात का 'ख़द्शा' है वो हो सकती है ऐसे नश्शे में लगातार मेरी सम्त न देख या कोई बात सुना या मुझे सीने से लगा इस तरह बैठ कर बेकार मेरी सम्त न देख तेरा यारों से नहीं जेब से याराना है ऐ मोहब्बत के दुकाँदार मेरी सम्त न देख

Ali Zaryoun

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अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं ख़ुद अपने साथ हूँ या'नी ख़ुदा के साथ हूँ मैं मुजावरान-ए-हवस तंग हैं कि यूँँ कैसे बग़ैर शर्म-ओ-हया भी हया के साथ हूँ मैं सफ़र शुरूअ' तो होने दे अपने साथ मिरा तू ख़ुद कहेगा ये कैसी बला के साथ हूँ मैं मैं छू गया तो तिरा रंग काट डालूँगा सो अपने आप से तुझ को बचा के साथ हूँ मैं दुरूद-बर-दिल-ए-वहशी सलाम-बर-तप-ए-इश्क़ ख़ुद अपनी हम्द ख़ुद अपनी सना के साथ हूँ मैं यही तो फ़र्क़ है मेरे और उन के हल के बीच शिकायतें हैं उन्हें और रज़ा के साथ हूँ मैं मैं अव्वलीन की इज़्ज़त में आख़िरीन का नूर वो इंतिहा हूँ कि हर इब्तिदा के साथ हूँ मैं दिखाई दूँ भी तो कैसे सुनाई दूँ भी तो क्यूँँ वरा-ए-नक़्श-ओ-नवा हूँ फ़ना के साथ हूँ मैं ब-हुक्म-ए-यार लवें कब्ज़ करने आती है बुझा रही है? बुझाए हवा के साथ हूँ मैं ये साबिरीन-ए-मोहब्बत ये काशिफ़ीन-ए-जुनूँ इन्ही के संग इन्हीं औलिया के साथ हूँ मैं किसी के साथ नहीं हूँ मगर जमाल-ए-इलाहा तिरी क़िस्म तिरे हर मुब्तला के साथ हूँ मैं ज़माने भर को पता है मैं किस तरीक़ पे हूँ सभी को इल्म है किस दिल-रुबा के साथ हूँ मैं मुनाफ़िक़ीन-ए-तसव्वुफ़ की मौत हूँ मैं 'अली' हर इक असील हर इक बे-रिया के साथ हूँ मैं

Ali Zaryoun

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चुप-चाप क्यूँ फिरो हो कोई बात तो करो हल भी निकालते हैं मुलाक़ात तो करो ख़ाली हवा में उड़ना फकीरी नहीं मियाँ दिल जोड़ के दिखाओ करामात तो करो

Ali Zaryoun

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तूर-ए-सीना है सर करोगे मियाँ अपने अंदर सफ़र करोगे मियाँ तुम हमें रोज़ याद करते हो फिर तो तुम उम्र भर करोगे मियाँ वो जो इक लफ्ज़ मर गया है उस को किस की ख़बर करोगे मियाँ और दिल-ए-दरवेश एक मदीना है तुम मदीने में सैर करोगे मियाँ

Ali Zaryoun

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