ghazalKuch Alfaaz

मोहब्बत पर न भूलो मोहब्बत बे-कसी है सुकून-ए-सर्व-ओ-सुंबुल सब अपनी सादगी है कहाँ वो बे-ख़ुदी थी कि ख़ुद हम बे-ख़बर थे अब इतनी बेकली है कि दुनिया जानती है कहो मुझ से कि दिल में नहीं कोई शिकायत तबीअ'त मंचली है बहाने ढूँडती है नमक सा गुफ़्तुगू में अनोखी मुस्कुराहट बदन पर धीरे-धीरे क़यामत आ रही है तुझे कैसे दिखाऊँ ये रातें ये उजाले जवानी सो गई है मोहब्बत जागती है उसी का शिकवा हर दम उसी का ज़िक्र सब से अगर ये दुश्मनी है तो अच्छी दुश्मनी है थकन है जाँ-फ़ज़ा सी बरसती है उदासी सितारे कह रहे हैं कि मंज़िल आ गई है पलट कर यूँँ न देखो उमडते बादलों से बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ भी सरकती चाँदनी है

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मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो आदमी ही मुझे रहने दो ख़ुदा मत समझो ये जो मैं होश में रहता नहीं तुम सेे मिल कर ये मिरा इश्क़ है तुम इस को नशा मत समझो रास आता नहीं सब को ये मोहब्बत का मरज़ मेरी बीमारी को तुम अपनी दवा मत समझो

Shakeel Azmi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं

Kaifi Azmi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं

Jaun Elia

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नाज़-ओ-अंदाज़ दिल दिखाने लगे अब वो फ़ित्ने समझ में आने लगे फिर वही इंतिज़ार की ज़ंजीर रात आई दिए जलाने लगे छाँव पड़ने लगी सितारों की रूह के ज़ख़्म झिलमिलाने लगे हाल अहवाल क्या बताएँ किसे सब इरादे गए ठिकाने लगे मंज़िल-ए-सुब्ह आ गई शायद रास्ते हर तरफ़ को जाने लगे

Mahboob Khizan

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सँभालने से तबीअत कहाँ सँभलती है वो बे-कसी है कि दुनिया रगों में चलती है ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है वो चाल हो कि बदन हो कमान जैसी कशिश क़दम से घात अदास अदा निकलती है तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है अजब इंसाफ़ इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है बिखर गए मुझे साँचे में ढालने वाले यहाँ तो ज़ात भी साँचे समेत ढलती है ख़िज़ाँ है हासिल-ए-हंगामा-ए-बहार 'ख़िज़ाँ' बहार फूलती है काएनात फलती है

Mahboob Khizan

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पलकों पर हसरत की घटाएँ हम भी पागल तुम भी जी न सकें और मरते जाएँ हम भी पागल तुम भी दोनों अपनी आन के सच्चे दोनों अक़्ल के अंधे हाथ बढ़ाएँ फिर हट जाएँ हम भी पागल तुम भी ख़्वाब में जैसे जान छुड़ा कर भाग न सकने वाले भागें और वहीं रह जाएँ हम भी पागल तुम भी संदल फूले जंगल जागे नाग फिरीं मतवाले नंगे पाँव चलें घबराएँ हम भी पागल तुम भी

Mahboob Khizan

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सबब तलाश न कर बस यूँँही है ये दुनिया वही बहुत है जो कुछ जानती है ये दुनिया खुलत में बंद हैं कोंपल के सोते जागते रंग परत परत में नई दिलकशी है ये दुनिया उलझते रहने में कुछ भी नहीं थकन के सिवा बहुत हक़ीर हैं हम तुम बड़ी है ये दुनिया ये लोग साँस भी लेते हैं ज़िंदा भी हैं मगर हर आन जैसे इन्हें रोकती है ये दुनिया बहुत दिनों तो ये शर्मिंदगी थी शामिल-ए-हाल हमीं ख़राब हैं अच्छी भली है ये दुनिया हरे-भरे रहें तेरे चमन तिरे गुलज़ार हरा है ज़ख़्म-ए-तमन्ना भरी है ये दुनिया तुम अपनी लहर में हो और किसी भँवर की तरह मैं दूसरा हूँ कोई तीसरी है ये दुनिया वो अपने साथ भी रहते हैं चुप भी रहते हैं जिन्हें ख़बर है कि क्या बेचती है ये दुनिया 'ख़िज़ाँ' न सोच कि बिकती है क्यूँँ बदन की बहार समझ कि रूह की सौदा-गरी है ये दुनिया

Mahboob Khizan

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मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता ख़ुलूस-ए-नाज़ की तौहीन भी देखी नहीं जाती शुऊर-ए-हुस्न को बेदार भी करते नहीं बनता तुझे अब क्या कहें ऐ मेहरबाँ अपना ही रोना है कि सारी ज़िंदगी ईसार भी करते नहीं बनता सितम देखो कि उस बे-दर्द से अपनी लड़ाई है जिसे शर्मिंदा-ए-पैकार भी करते नहीं बनता अदा रंजीदगी परवानगी आँसू-भरी आँखें अब इतनी सादगी क्या प्यार भी करते नहीं बनता जवानी मेहरबानी हुस्न भी अच्छी मुसीबत है उसे अच्छा उसे बीमार भी करते नहीं बनता भँवर से जी भी घबराता है लेकिन क्या किया जाए तवाफ़-ए-मौज-ए-कम-रफ़्तार भी करते नहीं बनता इसी दिल को भरी दुनिया के झगड़े झेलने ठहरे यही दिल जिस को दुनिया-दार भी करते नहीं बनता जलाती है दिलों को सर्द-मेहरी भी ज़माने की सवाल-ए-गर्मी-ए-बाज़ार भी करते नहीं बनता 'ख़िज़ाँ' उन की तवज्जोह ऐसी ना-मुम्किन नहीं लेकिन ज़रा सी बात पर इसरार भी करते नहीं बनता

Mahboob Khizan

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