palkon par hasrat ki ghataen ham bhi pagal tum bhi ji na saken aur marte jaaen ham bhi pagal tum bhi donon apni aan ke sachche donon aql ke andhe haath badhaen phir hat jaaen ham bhi pagal tum bhi khvab men jaise jaan chhuda kar bhaag na sakne vaale bhagen aur vahin rah jaaen ham bhi pagal tum bhi sandal phule jangal jaage naag phirin matvale nange paanv chalen ghabraen ham bhi pagal tum bhi palkon par hasrat ki ghataen hum bhi pagal tum bhi ji na saken aur marte jaen hum bhi pagal tum bhi donon apni aan ke sachche donon aql ke andhe hath badhaen phir hat jaen hum bhi pagal tum bhi khwab mein jaise jaan chhuda kar bhag na sakne wale bhagen aur wahin rah jaen hum bhi pagal tum bhi sandal phule jangal jage nag phirin matwale nange panw chalen ghabraen hum bhi pagal tum bhi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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पलकों पर हसरत की घटाएँ हम भी पागल तुम भी जी न सकें और मरते जाएँ हम भी पागल तुम भी दोनों अपनी आन के सच्चे दोनों अक़्ल के अंधे हाथ बढ़ाएँ फिर हट जाएँ हम भी पागल तुम भी ख़्वाब में जैसे जान छुड़ा कर भाग न सकने वाले भागें और वहीं रह जाएँ हम भी पागल तुम भी संदल फूले जंगल जागे नाग फिरीं मतवाले नंगे पाँव चलें घबराएँ हम भी पागल तुम भी
Mahboob Khizan
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नाज़-ओ-अंदाज़ दिल दिखाने लगे अब वो फ़ित्ने समझ में आने लगे फिर वही इंतिज़ार की ज़ंजीर रात आई दिए जलाने लगे छाँव पड़ने लगी सितारों की रूह के ज़ख़्म झिलमिलाने लगे हाल अहवाल क्या बताएँ किसे सब इरादे गए ठिकाने लगे मंज़िल-ए-सुब्ह आ गई शायद रास्ते हर तरफ़ को जाने लगे
Mahboob Khizan
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सबब तलाश न कर बस यूँँही है ये दुनिया वही बहुत है जो कुछ जानती है ये दुनिया खुलत में बंद हैं कोंपल के सोते जागते रंग परत परत में नई दिलकशी है ये दुनिया उलझते रहने में कुछ भी नहीं थकन के सिवा बहुत हक़ीर हैं हम तुम बड़ी है ये दुनिया ये लोग साँस भी लेते हैं ज़िंदा भी हैं मगर हर आन जैसे इन्हें रोकती है ये दुनिया बहुत दिनों तो ये शर्मिंदगी थी शामिल-ए-हाल हमीं ख़राब हैं अच्छी भली है ये दुनिया हरे-भरे रहें तेरे चमन तिरे गुलज़ार हरा है ज़ख़्म-ए-तमन्ना भरी है ये दुनिया तुम अपनी लहर में हो और किसी भँवर की तरह मैं दूसरा हूँ कोई तीसरी है ये दुनिया वो अपने साथ भी रहते हैं चुप भी रहते हैं जिन्हें ख़बर है कि क्या बेचती है ये दुनिया 'ख़िज़ाँ' न सोच कि बिकती है क्यूँँ बदन की बहार समझ कि रूह की सौदा-गरी है ये दुनिया
Mahboob Khizan
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सँभालने से तबीअत कहाँ सँभलती है वो बे-कसी है कि दुनिया रगों में चलती है ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है वो चाल हो कि बदन हो कमान जैसी कशिश क़दम से घात अदास अदा निकलती है तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है अजब इंसाफ़ इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है बिखर गए मुझे साँचे में ढालने वाले यहाँ तो ज़ात भी साँचे समेत ढलती है ख़िज़ाँ है हासिल-ए-हंगामा-ए-बहार 'ख़िज़ाँ' बहार फूलती है काएनात फलती है
Mahboob Khizan
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हम आप क़यामत से गुज़र क्यूँँ नहीं जाते जीने की शिकायत है तो मर क्यूँँ नहीं जाते कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँँ लोग सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँँ नहीं जाते आँखों में नमक है तो नज़र क्यूँँ नहीं आता पलकों पे गुहर हैं तो बिखर क्यूँँ नहीं जाते अख़बार में रोज़ाना वही शोर है या'नी अपने से ये हालात सँवर क्यूँँ नहीं जाते ये बात अभी मुझ को भी मालूम नहीं है पत्थर इधर आते हैं उधर क्यूँँ नहीं जाते तेरी ही तरह अब ये तिरे हिज्र के दिन भी जाते नज़र आते हैं मगर क्यूँँ नहीं जाते अब याद कभी आए तो आईने से पूछो 'महबूब-ख़िज़ाँ' शाम को घर क्यूँँ नहीं जाते
Mahboob Khizan
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