rakkhi hargiz na tire rukh ne rukh-e-badr ki qadr khoi kakul ne bhi akhir ko shab-e-qadr ki qadr izzat-o-qadr ki us gul se tavaqqoa hai abas vaan na izzat ki kuchh izzat hai na kuchh qadr ki qadr rasti khvar hai us chashm-e-fusun-parvar se haan magar manzilat-e-makr hai aur ghhadr ki qadr mai-paraston men hai yuun saghhar-o-mina ka vaqar jaise islam men ho mohtasib o sadr ki qadr kafsh-bardari se us mahr ki chamka hai 'nazir' varna kya khaak thi is zarra-e-be-qadr ki qadr rakkhi hargiz na tere rukh ne rukh-e-badr ki qadr khoi kakul ne bhi aakhir ko shab-e-qadr ki qadr izzat-o-qadr ki us gul se tawaqqoa hai abas wan na izzat ki kuchh izzat hai na kuchh qadr ki qadr rasti khwar hai us chashm-e-fusun-parwar se han magar manzilat-e-makr hai aur ghadr ki qadr mai-paraston mein hai yun saghar-o-mina ka waqar jaise islam mein ho mohtasib o sadr ki qadr kafsh-bardari se us mahr ki chamka hai 'nazir' warna kya khak thi is zarra-e-be-qadr ki qadr
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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जाने वाले से राब्ता रह जाए घर की दीवार पर दिया रह जाए इक नज़र जो भी देख ले तुझ को वो तिरे ख़्वाब देखता रह जाए इतनी गिर्हें लगी हैं इस दिल पर कोई खोले तो खोलता रह जाए कोई कमरे में आग तापता हो कोई बारिश में भीगता रह जाए नींद ऐसी कि रात कम पड़ जाए ख़्वाब ऐसा कि मुँह खुला रह जाए झील सैफ़-उल-मुलूक पर जाऊँ और कमरे में कैमरा रह जाए
Tehzeeb Hafi
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इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है मैं तिरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता रोज़ बँटती हुई ख़ैरात से डर लगता है हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी अब बदलते हुए हालात से डर लगता है दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ 'यासिर' घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है
Yasir Khan
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आइने का साथ प्यारा था कभी एक चेहरे पर गुज़ारा था कभी आज सब कहते हैं जिस को नाख़ुदा हम ने उस को पार उतारा था कभी ये मिरे घर की फ़ज़ा को क्या हुआ कब यहाँ मेरा तुम्हारा था कभी था मगर सब कुछ न था दरिया के पार इस किनारे भी किनारा था कभी कैसे टुकड़ों में उसे कर लूँ क़ुबूल जो मिरा सारे का सारा था कभी आज कितने ग़म हैं रोने के लिए इक तिरे दुख का सहारा था कभी जुस्तुजू इतनी भी बे-मा'नी न थी मंज़िलों ने भी पुकारा था कभी ये नए गुमराह क्या जानें मुझे मैं सफ़र का इस्तिआ'रा था कभी इश्क़ के क़िस्से न छेड़ो दोस्तो मैं इसी मैदाँ में हारा था कभी
Shariq Kaifi
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घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो इस मुसाफ़िर को तो रस्ते में ठहर जाना है मौत लम्हे की सदा ज़िंदगी 'उम्रों की पुकार मैं यही सोच के ज़िंदा हूँ कि मर जाना है नश्शा ऐसा था कि मय-ख़ाने को दुनिया समझा होश आया तो ख़याल आया कि घर जाना है मिरे जज़्बे की बड़ी क़द्र है लोगों में मगर मेरे जज़्बे को मिरे साथ ही मर जाना है
Rahat Indori
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