ghazalKuch Alfaaz

सब इंतिज़ार में थे कब कोई ज़बान खुले फिर उस के होंठ खुले और सबके कान खुले हो चाहें जितना हसीं ख़्वाब याद रहता नहीं जब आँख दर्जनों लोगों के दरमियान खुले बहुत सा लेंगे किराया जरा सी देंगे जगह यहाँ के लोगों के दिल तंग है मकान खुले गया वो शख़्स तो नजरें उठाई लोगों ने हवा चली तो जहाजों के बाजबान खुले ये किस ने मेज़ पे छोड़ी है होंठों की तस्वीर ये किस ने रखे हैं चीनी के मर्तबान खुले

Umair Najmi20 Likes

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा

Umair Najmi

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तुम इस ख़राबे में चार छे दिन टहल गई हो सो ऐन-मुमकिन है दिल की हालत बदल गई हो तमाम दिन इस दुआ में कटता है कुछ दिनों से मैं जाऊँ कमरे में तो उदासी निकल गई हो किसी के आने पे ऐसे हलचल हुई है मुझ में ख़मोश जंगल में जैसे बंदूक़ चल गई हो ये न हो गर मैं हिलूँ तो गिरने लगे बुरादा दुखों की दीमक बदन की लकड़ी निगल गई हो ये छोटे छोटे कई हवादिस जो हो रहे हैं किसी के सर से बड़ी मुसीबत न टल गई हो हमारा मलबा हमारे क़दमों में आ गिरा है प्लेट में जैसे मोम-बत्ती पिघल गई हो

Umair Najmi

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हर इक हज़ार में बस पाँच सात हैं हम लोग निसाब-ए-इश्क़ पे वाजिब ज़कात हैं हम लोग दबाओ में भी जमाअत कभी नहीं बदली शुरूअ' दिन से मोहब्बत के साथ हैं हम लोग जो सीखनी हो ज़बान-ए-सुकूत बिस्मिल्लाह ख़मोशियों की मुकम्मल लुग़ात हैं हम लोग कहानियों के वो किरदार जो लिखे न गए ख़बर से हज़्फ़-शुदा वाक़िआ''त हैं हम लोग ये इंतिज़ार हमें देख कर बनाया गया ज़ुहूर-ए-हिज्र से पहले की बात हैं हम लोग किसी को रास्ता दे दें किसी को पानी न दें कहीं पे नील कहीं पर फ़ुरात हैं हम लोग हमें जला के कोई शब गुज़ार सकता है सड़क पे बिखरे हुए काग़ज़ात हैं हम लोग

Umair Najmi

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जहान भर की तमाम आँखें निचोड़ कर जितना नम बनेगा ये कुल मिला कर भी हिज्र की रात मेरे गिर्ये से कम बनेगा मैं दश्त हूँ ये मुग़ालता है न शाइ'राना मुबालग़ा है मिरे बदन पर कहीं क़दम रख के देख नक़्श-ए-क़दम बनेगा हमारा लाशा बहाओ वर्ना लहद मुक़द्दस मज़ार होगी ये सुर्ख़ कुर्ता जलाओ वर्ना बग़ावतों का अलम बनेगा तो क्यूँँ न हम पाँच सात दिन तक मज़ीद सोचें बनाने से क़ब्ल मिरी छटी हिस बता रही है ये रिश्ता टूटेगा ग़म बनेगा मुझ ऐसे लोगों का टेढ़-पन क़ुदरती है सो ए'तिराज़ कैसा शदीद नम ख़ाक से जो पैकर बनेगा ये तय है ख़म बनेगा सुना हुआ है जहाँ में बे-कार कुछ नहीं है सो जी रहे हैं बना हुआ है यक़ीं कि इस राएगानी से कुछ अहम बनेगा कि शाहज़ादे की आदतें देख कर सभी इस पर मुत्तफ़िक़ हैं ये जूँ ही हाकिम बना महल का वसीअ' रक़्बा हरम बनेगा मैं एक तरतीब से लगाता रहा हूँ अब तक सुकूत अपना सदा के वक़्फ़े निकाल इस को शुरूअ' से सुन रिदम बनेगा सफ़ेद रूमाल जब कबूतर नहीं बना तो वो शो'बदा-बाज़ पलटने वालों से कह रहा था रुको ख़ुदा की क़सम बनेगा

Umair Najmi

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तुम को वेहशत तो सीखा दी गुजारें लाइक़ और कोई हुक्म कोई काम हमारे लाइक़ माजरत में तो किसी और के मसरफ में हुं ढूंढ देता हु मगर कोई तुम्हारे लाइक़ एक दो ज़ख़्मों की गहराई और आँखों के खंडर और कुछ ख़ास नहीं मुझ में नज़ारे लाइक़ घोंसला छाव हरा रंग समर कुछ भी नहीं देख मुझ जैसे शजर होते है आरे लाइक़ इस इलाक़े में उजालों की जगह कोई नहीं सिर्फ़ परचम है यहाँ चाँद सितारे लाइक़ मुझ निक्क में को चुना उस ने तरस खा के उमेर देखते रह गए हसरत से बेचारे लाइक़

Umair Najmi

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