sau khulus baton men sab karam khayalon men bas zara vafa kam hai tere shahr valon men pahli baar nazron ne chand bolte dekha ham javab kya dete kho gae savalon men raat teri yadon ne dil ko is tarah chheda jaise koi chutki le narm narm galon men yuun kisi ki ankhon men subh tak abhi the ham jis tarah rahe shabnam phuul ke piyalon men meri aankh ke taare ab na dekh paoge raat ke musafir the kho gae ujalon men jaise aadhi shab ke baa'd chand niind men chaunke vo gulab ki jumbish un siyah balon men sau khulus baaton mein sab karam khayalon mein bas zara wafa kam hai tere shahr walon mein pahli bar nazron ne chand bolte dekha hum jawab kya dete kho gae sawalon mein raat teri yaadon ne dil ko is tarah chheda jaise koi chutki le narm narm galon mein yun kisi ki aankhon mein subh tak abhi the hum jis tarah rahe shabnam phul ke piyalon mein meri aankh ke tare ab na dekh paoge raat ke musafir the kho gae ujalon mein jaise aadhi shab ke ba'd chand nind mein chaunke wo gulab ki jumbish un siyah baalon mein
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा पी मिरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ मय-कदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा
Bashir Badr
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फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है
Bashir Badr
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मिरी नज़र में ख़ाक तेरे आइने पे गर्द है ये चाँद कितना ज़र्द है ये रात कितनी सर्द है कभी कभी तो यूँँ लगा कि हम सभी मशीन हैं तमाम शहर में न कोई ज़न न कोई मर्द है ख़ुदा की नज़्मों की किताब सारी काएनात है ग़ज़ल के शे'र की तरह हर एक फ़र्द फ़र्द है हयात आज भी कनीज़ है हुज़ूर-ए-जब्र में जो ज़िंदगी को जीत ले वो ज़िंदगी का मर्द है इसे तबर्रुक-ए-हयात कह के पलकों पर रखूँ अगर मुझे यक़ीन हो ये रास्ते की गर्द है वो जिन के ज़िक्र से रगों में दौड़ती थीं बिजलियाँ उन्हीं का हाथ हम ने छू के देखा कितना सर्द है
Bashir Badr
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फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे और इस दिल की तरफ़ बरसे तो पत्थर बरसे कोई बादल हो तो थम जाए मगर अश्क मिरे एक रफ़्तार से दिन रात बराबर बरसे बर्फ़ के फूलों से रौशन हुई तारीक ज़मीं रात की शाख़ से जैसे मह ओ अख़्तर बरसे प्यार का गीत अँधेरों पे उजालों की फुवार और नफ़रत की सदा शीशे पे पत्थर बरसे बारिशें छत पे खुली जगहों पे होती हैं मगर ग़म वो सावन है जो उन कमरों के अंदर बरसे
Bashir Badr
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मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है तमाम मुल्क में वो सब से ख़ूब-सूरत है कभी कभी कोई इंसान ऐसा लगता है पुराने शहर में जैसे नई इमारत है जमी है देर से कमरे में ग़ीबतों की नशिस्त फ़ज़ा में गर्द है माहौल में कुदूरत है बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम मुझे पता चला वो कितनी ख़ूब-सूरत है ये ज़ाइरान-ए-अली-गढ़ का ख़ास तोहफ़ा है मिरी ग़ज़ल का तबर्रुक दिलों की बरकत है
Bashir Badr
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