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tere siva kisi ki tamanna karunga main aisa kabhi hua hai jo aisa karunga main go ghham aziiz hai mujhe tere firaq ka phir bhi is imtihan ka shikva karunga main ankhon ko ashk o khuun bhi faraham karunga main dil ke liye bhi dard muhayya karunga main rahat bhi ranj, ranj bhi rahat ho jab to phir kya etibar-e-khvahish-e-duniya karunga main rakkha hai kya jahan men ye aur baat hai ye aur baat hai ki taqaza karunga main ye rahguzar ki ja-e-qayam-e-qarar thi yaani ab us gali se bhi guzra karunga main yaani kuchh is tarah ki tujhe bhi khabar na ho is ehtiyat se tujhe dekha karunga main hai dekhne ki chiiz to ye iltifat bhi dekhoge tum gurez bhi aisa karunga main hairan o dil-shikasta huun is hal-e-zar par kab janta tha apna tamasha karunga main haan khinch lunga vaqt ki zanjir paanv se ab ke bahar aai to aisa karunga main tere siwa kisi ki tamanna karunga main aisa kabhi hua hai jo aisa karunga main go gham aziz hai mujhe tere firaq ka phir bhi is imtihan ka shikwa karunga main aankhon ko ashk o khun bhi faraham karunga main dil ke liye bhi dard muhayya karunga main rahat bhi ranj, ranj bhi rahat ho jab to phir kya etibar-e-khwahish-e-duniya karunga main rakkha hai kya jahan mein ye aur baat hai ye aur baat hai ki taqaza karunga main ye rahguzar ki ja-e-qayam-e-qarar thi yani ab us gali se bhi guzra karunga main yani kuchh is tarah ki tujhe bhi khabar na ho is ehtiyat se tujhe dekha karunga main hai dekhne ki chiz to ye iltifat bhi dekhoge tum gurez bhi aisa karunga main hairan o dil-shikasta hun is haal-e-zar par kab jaanta tha apna tamasha karunga main han khinch lunga waqt ki zanjir panw se ab ke bahaar aai to aisa karunga main

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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दीवार याद आ गई दर याद आ गया दो गाम ही चले थे कि घर याद आ गया कुछ कहना चाहते थे कि ख़ामोश हो गए दस्तार याद आ गई सर याद आ गया दुनिया की बे-रुख़ी का गिला कर रहे थे लोग हम को तिरा तपाक मगर याद आ गया फिर तीरगी-ए-राहगुज़र याद आ गई फिर वो चराग़-ए-राहगुज़र याद आ गया 'अजमल'-सिराज हम उसे भूल हुए तो हैं क्या जाने क्या करेंगे अगर याद आ गया

Ajmal Siraj

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तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँँगा मैं ऐसा कभी हुआ है जो ऐसा करूँँगा मैं गो ग़म अज़ीज़ है मुझे तेरे फ़िराक़ का फिर भी इस इम्तिहान का शिकवा करूँँगा मैं आँखों को अश्क ओ ख़ूँ भी फ़राहम करूँँगा मैं दिल के लिए भी दर्द मुहय्या करूँँगा मैं राहत भी रंज, रंज भी राहत हो जब तो फिर क्या एतिबार-ए-ख़्वाहिश-ए-दुनिया करूँँगा मैं रक्खा है क्या जहान में ये और बात है ये और बात है कि तक़ाज़ा करूँँगा मैं ये रहगुज़र कि जा-ए-क़याम-ओ-क़रार थी या'नी अब उस गली से भी गुज़रा करूँँगा मैं या'नी कुछ इस तरह कि तुझे भी ख़बर न हो इस एहतियात से तुझे देखा करूँँगा मैं है देखने की चीज़ तो ये इल्तिफ़ात भी देखोगे तुम गुरेज़ भी ऐसा करूँँगा मैं हैरान ओ दिल-शिकस्ता हूँ इस हाल-ए-ज़ार पर कब जानता था अपना तमाशा करूँँगा मैं हाँ खींच लूँगा वक़्त की ज़ंजीर पाँव से अब के बहार आई तो ऐसा करूँँगा मैं

Ajmal Siraj

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बुझ गया रात वो सितारा भी हाल अच्छा नहीं हमारा भी ये जो हम खोए खोए रहते हैं इस में कुछ दख़्ल है तुम्हारा भी डूबना ज़ात के समुंदर में है ये तूफ़ान भी किनारा भी अब मुझे नींद ही नहीं आती ख़्वाब है ख़्वाब का सहारा भी लोग जीते हैं किस तरह 'अजमल' हम से होता नहीं गुज़ारा भी

Ajmal Siraj

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शाम अपनी बे-मज़ा जाती है रोज़ और सितम ये है कि आ जाती है रोज़ कोई दिन आसाँ नहीं जाता मिरा कोई मुश्किल आज़मा जाती है रोज़ मुझ से पूछे कोई क्या है ज़िंदगी मेरे सर से ये बला जाती है रोज़ जाने किस की सुर्ख़-रूई के लिए ख़ूँ में ये धरती नहा जाती है रोज़ गीत गाते हैं परिंदे सुब्ह ओ शाम या समाअ'त चहचहा जाती है रोज़ देखने वालों को 'अजमल' ज़िंदगी रंग कितने ही दिखा जाती है रोज़

Ajmal Siraj

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हम अपने-आप में रहते हैं दम में दम जैसे हमारे साथ हों दो-चार भी जो हम जैसे किसे दिमाग़ जुनूँ की मिज़ाज-पुर्सी का सुनेगा कौन गुज़रती है शाम-ए-ग़म जैसे भला हुआ कि तिरा नक़्श-ए-पा नज़र आया ख़िरद को रास्ता समझे हुए थे हम जैसे मिरी मिसाल तो ऐसी है जैसे ख़्वाब कोई मिरा वजूद समझ लीजिए अदम जैसे अब आप ख़ुद ही बताएँ ये ज़िंदगी क्या है करम भी उस ने किए हैं मगर सितम जैसे

Ajmal Siraj

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