तुझ पर मिरी मोहब्बत क़ुर्बान हो न जाए ये कुफ़्र बढ़ते बढ़ते ईमान हो न जाए अल्लाह री बे-नक़ाबी उस जान-ए-मुद्दआ की मेरी निगाह-ए-हसरत हैरान हो न जाए मेरी तरफ़ न देखो अपनी नज़र को रोको दुनिया-ए-आशिक़ी में हैजान हो न जाए पलकों पे रुक गया है आ कर जो एक आँसू ये क़तरा बढ़ते बढ़ते तूफ़ान हो न जाए हद्द-ए-सितम तो है भी हद्द-ए-वफ़ा नहीं है ज़ालिम तिरा सितम भी एहसान हो न जाए होती नहीं है वक़अत होती नहीं है इज़्ज़त जब तक कि कोई इंसाँ इंसान हो न जाए उस वक़्त तक मुकम्मल होता नहीं है कोई जब तक कि ख़ुद को अपनी पहचान हो न जाए 'बहज़ाद' इस लिए मैं कहता नहीं हूँ दिल की डरता हूँ सुन के दुनिया हैरान हो न जाए
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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अगर तू बे-वफ़ा है ध्यान रखना मुझे सब कुछ पता है ध्यान रखना बिछड़ते वक़्त हम ने कह दिया था हमारा दिल दुखा है ध्यान रखना ख़ुदा जिस की मोहब्बत में बनी हो वो कइयों का ख़ुदा है ध्यान रखना जिसे तुम दोस्त केवल जानती हो वो तुम को चाहता है ध्यान रखना
Anand Raj Singh
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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है
Tehzeeb Hafi
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मोहब्बत मुस्तक़िल कैफ़-आफ़रीं मालूम होती है ख़लिश दिल में जहाँ पर थी वहीं मालूम होती है तिरे जल्वों से टकरा कर नहीं मालूम होती है नज़र भी एक मौज-ए-तह-नशीं मालूम होती है नुक़ूश-ए-पा के सदक़े बंदगी-इश्क़ के क़ुर्बां मुझे हर सम्त अपनी ही जबीं मालूम होती है मिरी रग रग में यूँँ तो दौड़ती है इश्क़ की बिजली कहीं ज़ाहिर नहीं होती कहीं मालूम होती है ये ए'जाज़-ए-नज़र कब है ये कब है हुस्न की काविश हसीं जो चीज़ होती है हसीं मालूम होती है उमीदें तोड़ दे मेरे दिल-ए-मुज़्तर ख़ुदा-हाफ़िज़ ज़बान-ए-हुस्न पर अब तक नहीं मालूम होती है उसे क्यूँँ मय-कदा कहता है बतला दे मिरे साक़ी यहाँ की सर-ज़मीं ख़ुल्द-ए-बरीं मालूम होती है अरे ऐ चारा-गर हाँ हाँ ख़लिश तू जिस को कहता है ये शय दिल में नहीं दिल के क़रीं मालूम होती है किसी के पा-ए-नाज़ुक पर झुकी है और नहीं उठती मुझे 'बहज़ाद' ये अपनी जबीं मालूम होती है
Behzad Lakhnavi
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है ख़िरद-मंदी यही बा-होश दीवाना रहे है वही अपना कि जो अपने से बेगाना रहे कुफ़्र से ये इल्तिजाएँ कर रहा हूँ बार बार जाऊँ तो का'बा मगर रुख़ सू-ए-मय-ख़ाना रहे शम-ए-सोज़ाँ कुछ ख़बर भी है तुझे ओ मस्त-ए-ग़म हुस्न-ए-महफ़िल है जभी जब तक कि परवाना रहे ज़ख़्म-ए-दिल ऐ ज़ख़्म-ए-दिल नासूर क्यूँँ बनता नहीं लुत्फ़ तो जब है कि अफ़्साने में अफ़्साना रहे हम को वाइज़ का भी दिल रखना है साक़ी का भी दिल हम तो तौबा कर के भी पाबंद-ए-मय-ख़ाना रहे आख़िरश कब तक रहेंगी हुस्न की नादानियाँ हुस्न से पूछो कि कब तक इश्क़ दीवाना रहे फ़ैज़-ए-राह-ए-इश्क़ है या फ़ैज़-ए-जज़्ब-ए-इश्क़ है हम तो मंज़िल पा के भी मंज़िल से बेगाना रहे मय-कदे में हम दुआएँ कर रहे हैं बार बार इस तरफ़ भी चश्म-ए-मस्त-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना रहे आज तो साक़ी से ये 'बहज़ाद' ने बाँधा है अहद लब पे तौबा हो मगर हाथों में पैमाना रहे
Behzad Lakhnavi
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दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ' कहाँ है जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की का'बा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे 'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे
Behzad Lakhnavi
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इक बे-वफ़ा को प्यार किया हाए क्या किया ख़ुद दिल को बे-क़रार किया हाए क्या किया मालूम था कि अहद-ए-वफ़ा उन का झूट है इस पर भी ए'तिबार किया हाए क्या किया वो दिल कि जिस पे क़ीमत-ए-कौनैन थी निसार नज़्र-ए-निगाह-ए-यार किया हाए क्या किया ख़ुद हम ने फ़ाश फ़ाश किया राज़-ए-आशिक़ी दामन को तार तार किया हाए क्या किया आहें भी बार बार भरीं उन के हिज्र में नाला भी बार बार किया हाए क्या किया मिटने का ग़म नहीं है बस इतना मलाल ही क्यूँँ तेरा इंतिज़ार किया हाए क्या किया हम ने तो ग़म को सीने से अपने लगा लिया ग़म ने हमें शिकार किया हाए क्या किया सय्याद की रज़ा ये हम आँसू न पी सके उज़्र-ए-ग़म-बहार किया हाए क्या किया क़िस्मत ने आह हम को ये दिन भी दिखा दिए क़िस्मत पे ए'तिबार किया हाए क्या किया रंगीनी-ए-ख़याल से कुछ भी न बच सका हर शय को पुर-बहार किया हाए क्या किया दिल ने भुला भुला के तिरी बेवफ़ाइयाँ फिर अहद उस्तुवार किया हाए क्या किया उन के सितम भी सह के न उन से किया गिला क्यूँँ जब्र इख़्तियार किया हाए क्या किया काफ़िर की चश्म-ए-नाज़ पे क्या दिल-जिगर का ज़िक्र ईमान तक निसार किया हाए क्या किया काली घटा के उठते ही तौबा न रह सकी तौबा पे ए'तिबार किया हाए क्या किया शाम-ए-फ़िराक़ क़ल्ब के दाग़ों को गिन लिया तारों को भी शुमार किया हाए क्या किया 'बहज़ाद' की न क़दर कोई तुम को हो सकी तुम ने ज़लील-ओ-ख़्वार क्या हाए क्या किया
Behzad Lakhnavi
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ख़ुदा को ढूँड रहा था कहीं ख़ुदा न मिला ज़हे-नसीब कि बंदे को मुद्दआ' न मिला निगाह-ए-शौक़ में बे-नूरियों का रंग बढ़ा निगाह-ए-शौक़ को जब कोई दूसरा न मिला हम अपनी बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पर निसार रहे ख़ुदी को ढूँढ़ लिया जब हमें ख़ुदा न मिला तुम्हारी बज़्म में लब खोल कर हुआ ख़ामोश वो बद-नसीब जिसे कोई आसरा न मिला हर एक ज़र्रे में मैं ख़ुद तो आ रहा था नज़र अजीब बात तुम्हारा कहीं पता न मिला बस इक सुकून ही हम को न मिल सका ता-उम्र वगरना तेरे तसद्दुक़ में हम को क्या न मिला तिरी निगाह-ए-मोहब्बत-नवाज़ ही की क़सम कि आज तक तो हमें तुझ सा दूसरा न मिला तिरा जमाल फ़ज़ाओं में मुंतशिर था मगर निगाह-ए-शौक़ को फिर भी तिरा पता न मिला हज़ार ठोकरें खाईं हज़ार सू 'बहज़ाद' जहान-ए-हुस्न में कोई भी बा-वफ़ा न मिला
Behzad Lakhnavi
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