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उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा जिस घड़ी आया पलट कर इक मिरा बिछड़ा हुआ आम से कपड़ों में था वो फिर भी शहज़ादा लगा हर घड़ी तय्यार है दिल जान देने के लिए उस ने पूछा भी नहीं ये फिर भी आमादा लगा कारवाँ है या सराब-ए-ज़िंदगी है क्या है ये एक मंज़िल का निशाँ इक और ही जादा लगा रौशनी ऐसी अजब थी रंग-भूमी की 'नसीम' हो गए किरदार मुदग़म कृष्ण भी राधा लगा

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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इस क़दर भी तो न जज़्बात पे क़ाबू रक्खो थक गए हो तो मिरे काँधे पे बाज़ू रक्खो भूलने पाए न इस दश्त की वहशत दिल से शहर के बीच रहो बाग़ में आहू रक्खो ख़ुश्क हो जाएगी रोते हुए सहरा की तरह कुछ बचा कर भी तो इस आँख में आँसू रक्खो रौशनी होगी तो आ जाएगा रह-रव दिल का उस की यादों के दिए ताक़ में हर-सू रक्खो याद आएगी तुम्हारी ही सफ़र में उस को उस के रूमाल में इक अच्छी सी ख़ुश्बू रक्खो अब वो महबूब नहीं अपना मगर दोस्त तो है उस से ये एक तअ'ल्लुक़ ही बहर-सू रक्खो

Iftikhar Naseem

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न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना गए हुए के लिए दिल में कुछ जगह रखना हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना न हो कि क़ुर्ब ही फिर मर्ग-ए-रब्त बन जाए वो अब मिले तो ज़रा उस से फ़ासला रखना उतार फेंक दे ख़ुश-फ़हमियों के सारे ग़िलाफ़ जो शख़्स भूल गया उस को याद क्या रखना अभी न इल्म हो उस को लहू की लज़्ज़त का ये राज़ उस से बहुत देर तक छुपा रखना कभी न लाना मसाइल घरों के दफ़्तर में ये दोनों पहलू हमेशा जुदा जुदा रखना उड़ा दिया है जिसे चूम कर हवा में 'नसीम' उसे हमेशा हिफ़ाज़त में ऐ ख़ुदा रखना

Iftikhar Naseem

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लगेगा अजनबी अब क्यूँ न शहर भर मुझ को बचा गया है नज़र तू भी देख कर मुझ को मैं घूम फिर के उसी सम्त आ निकलता हूँ जकड़ रही है तिरे घर की रहगुज़र मुझ को झुलस रहा है बदन ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार बुला रहा है कोई दश्त-ए-बे-शजर मुझ को मैं संग-दिल हूँ तुझे भूलता ही जाता हूँ मैं हँस रहा हूँ तो मिल के उदास कर मुझ को मैं देखता ही रहूँगा तुझे किनारे से तू ढूँढ़ता ही रहेगा भँवर भँवर मुझ को बनी हैं तुंद हवाओं की ज़र्द दीवारें उड़ा रहा है मगर शो'ला-ए-सफ़र मुझ को बना दिया है निडर ज़िद्दी ख़्वाहिशों ने 'नसीम' ख़ुद ए'तिमाद न था अपने आप पर मुझ को

Iftikhar Naseem

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ख़ुद को हुजूम-ए-दहर में खोना पड़ा मुझे जैसे थे लोग वैसा ही होना पड़ा मुझे दुश्मन को मरते देख के लोगों के सामने दिल हँस रहा था आँख से रोना पड़ा मुझे कुछ इस क़दर थे फूल ज़मीं पर खिले हुए तारों को आसमान में बोना पड़ा मुझे ऐसी शिकस्त थी कि कटी उँगलियों के साथ काँटों का एक हार पिरोना पड़ा मुझे कारी नहीं था वार मगर एक उम्र तक आब-ए-नमक से ज़ख़्म को धोना पड़ा मुझे आसाँ नहीं है लिखना ग़म-ए-दिल की वारदात अपना क़लम लहू में डुबोना पड़ा मुझे इतनी तवील ओ सर्द शब-ए-हिज्र थी 'नसीम' कितनी ही बार जागना सोना पड़ा मुझे

Iftikhar Naseem

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अपना सारा बोझ ज़मीं पर फेंक दिया तुझ को ख़त लिक्खा और लिख कर फेंक दिया ख़ुद को साकिन देखा ठहरे पानी में जाने क्या कुछ सोच के पत्थर फेंक दिया दीवारें क्यूँँ ख़ाली ख़ाली लगती हैं किस ने सब कुछ घर से बाहर फेंक दिया मैं तो अपना जिस्म सुखाने निकला था बारिश ने फिर मुझ पे समुंदर फेंक दिया वो कैसा था उस को कहाँ पर देखा था अपनी आँखों ने हर मंज़र फेंक दिया

Iftikhar Naseem

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