ghazalKuch Alfaaz

viran sarae ka diya hai jo kaun-o-makan men jal raha hai ye kaisi bichhadne ki saza hai aine men chehra rakh gaya hai khurshid misal shakhs kal shaam mitti ke supurd kar diya hai tum mar gae hausla tumhara zinda huun ye mera hausla hai andar bhi zamin ke raushni ho mitti men charaghh rakh diya hai main kaun sa khvab dekhta huun ye kaun se mulk ki faza hai vo kaun sa haath hai ki jis ne mujh aag ko khaak se likha hai rakkha tha khala men paanv main ne raste men sitara aa gaya hai shayad ki khuda men aur mujh men ik jast ka aur fasla hai gardish men hain kitni kaenaten bachcha mira paanv chal raha hai viran sarae ka diya hai jo kaun-o-makan mein jal raha hai ye kaisi bichhadne ki saza hai aaine mein chehra rakh gaya hai khurshid misal shakhs kal sham mitti ke supurd kar diya hai tum mar gae hausla tumhaara zinda hun ye mera hausla hai andar bhi zamin ke raushni ho mitti mein charagh rakh diya hai main kaun sa khwab dekhta hun ye kaun se mulk ki faza hai wo kaun sa hath hai ki jis ne mujh aag ko khak se likha hai rakkha tha khala mein panw main ne raste mein sitara aa gaya hai shayad ki khuda mein aur mujh mein ek jast ka aur fasla hai gardish mein hain kitni kaenaten bachcha mera panw chal raha hai

Related Ghazal

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

190 likes

More from Obaidullah Aleem

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए

Obaidullah Aleem

1 likes

कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ

Obaidullah Aleem

1 likes

ऐसी तेज़ हवा और ऐसी रात नहीं देखी लेकिन हम ने मौला जैसी ज़ात नहीं देखी उस की शान-ए-अजीब का मंज़र देखने वाला है इक ऐसा ख़ुर्शीद कि जिस ने रात नहीं देखी बिस्तर पर मौजूद रहे और सैर-ए-हफ़्त-अफ़्लाक ऐसी किसी पर रहमत की बरसात नहीं देखी उस की आल वही जो उस के नक़्श-ए-क़दम पर सिर्फ़ ज़ात की हम ने आल-ए-सादात नहीं देखी एक शजर है जिस की शाख़ें फैलती जाती हैं किसी शजर में हम ने ऐसी बात नहीं देखी इक दरिया-ए-रहमत है जो बहता जाता है ये शान-ए-बरकात किसी के साथ नहीं देखी शाहों की तारीख़ भी हम ने देखी है लेकिन उस के दर के गदाओं वाली बात नहीं देखी उस के नाम पे मारें खाना अब एज़ाज़ हमारा और किसी की ये इज़्ज़त औक़ात नहीं देखी सदियों की इस धूप छाँव में कोई हमें बतलाए पूरी हुई कौन सी उस की बात नहीं देखी अहल-ए-ज़मीं ने कौन सा हम पर ज़ुल्म नहीं ढाया कौन सी नुसरत हम ने उस के हाथ नहीं देखी

Obaidullah Aleem

0 likes

शिकस्ता-हाल सा बे-आसरा सा लगता है ये शहर दिल से ज़ियादा दुखा सा लगता है हर इक के साथ कोई वाक़िआ' सा लगता है जिसे भी देखो वो खोया हुआ सा लगता है ज़मीन है सो वो अपनी गर्दिशों में कहीं जो चाँद है सो वो टूटा हुआ सा लगता है मेरे वतन पे उतरते हुए अँधेरों को जो तुम कहो मुझे क़हर-ए-ख़ुदा सा लगता है जो शाम आई तो फिर शाम का लगा दरबार जो दिन हुआ तो वो दिन कर्बला सा लगता है ये रात खा गई इक एक कर के सारे चराग़ जो रह गया है वो बुझता हुआ सा लगता है दुआ करो कि मैं उस के लिए दुआ हो जाऊँ वो एक शख़्स जो दिल को दुआ सा लगता है तो दिल में बुझने सी लगती है काएनात तमाम कभी कभी जो मुझे तू बुझा सा लगता है जो आ रही है सदा ग़ौर से सुनो उस को कि इस सदा में ख़ुदा बोलता सा लगता है अभी ख़रीद लें दुनिया कहाँ की महँगी है मगर ज़मीर का सौदा बुरा सा लगता है ये मौत है या कोई आख़िरी विसाल के बा'द अजब सुकून में सोया हुआ सा लगता है हवा-ए-रंग-ए-दो-आलम में जागती हुई लय 'अलीम' ही कहीं नग़्मा-सरा सा लगता है

Obaidullah Aleem

0 likes

वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था

Obaidullah Aleem

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Obaidullah Aleem.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Obaidullah Aleem's ghazal.