ghazalKuch Alfaaz

ya mujhe afsar-e-shahana banaya hota ya mira taaj gadayana banaya hota apna divana banaya mujhe hota tu ne kyuun khirad-mand banaya na banaya hota khaksari ke liye garche banaya tha mujhe kaash khak-e-dar-e-janana banaya hota nashsha-e-ishq ka gar zarf diya tha mujh ko umr ka tang na paimana banaya hota dil-e-sad-chak banaya to bala se lekin zulf-e-mushkin ka tire shana banaya hota sufiyon ke jo na tha laeq-e-sohbat to mujhe qabil-e-jalsa-e-rindana banaya hota tha jalana hi agar duri-e-saqi se mujhe to charaghh-e-dar-e-mai-khana banaya hota shola-e-husn chaman men na dikhaya us ne varna bulbul ko bhi parvana banaya hota roz mamura-e-duniya men kharabi hai 'zafar' aisi basti ko to virana banaya hota ya mujhe afsar-e-shahana banaya hota ya mera taj gadayana banaya hota apna diwana banaya mujhe hota tu ne kyun khirad-mand banaya na banaya hota khaksari ke liye garche banaya tha mujhe kash khak-e-dar-e-jaanana banaya hota nashsha-e-ishq ka gar zarf diya tha mujh ko umr ka tang na paimana banaya hota dil-e-sad-chaak banaya to bala se lekin zulf-e-mushkin ka tere shana banaya hota sufiyon ke jo na tha laeq-e-sohbat to mujhe qabil-e-jalsa-e-rindana banaya hota tha jalana hi agar duri-e-saqi se mujhe to charagh-e-dar-e-mai-khana banaya hota shola-e-husn chaman mein na dikhaya us ne warna bulbul ko bhi parwana banaya hota roz mamura-e-duniya mein kharabi hai 'zafar' aisi basti ko to virana banaya hota

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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इस तरह से न आज़माओ मुझे उस की तस्वीर मत दिखाओ मुझे ऐन मुमकिन है मैं पलट आऊँ उस की आवाज़ में बुलाओ मुझे मैं ने बोला था याद मत आना झूठ बोला था याद आओ मुझे

Ali Zaryoun

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हम ने तिरी ख़ातिर से दिल-ए-ज़ार भी छोड़ा तू भी न हुआ यार और इक यार भी छोड़ा क्या होगा रफ़ूगर से रफ़ू मेरा गरेबान ऐ दस्त-ए-जुनूँ तू ने नहीं तार भी छोड़ा दीं दे के गया कुफ़्र के भी काम से आशिक़ तस्बीह के साथ उस ने तो ज़ुन्नार भी छोड़ा गोशे में तिरी चश्म-ए-सियह-मस्त के दिल ने की जब से जगह ख़ाना-ए-ख़ु़म्मार भी छोड़ा इस से है ग़रीबों को तसल्ली कि अजल ने मुफ़्लिस को जो मारा तो न ज़रदार भी छोड़ा टेढ़े न हो हम से रखो इख़्लास तो सीधा तुम प्यार से रुकते हो तो लो प्यार भी छोड़ा क्या छोड़ें असीरान-ए-मोहब्बत को वो जिस ने सदक़े में न इक मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार भी छोड़ा पहुँची मिरी रुस्वाई की क्यूँँकर ख़बर उस को उस शोख़ ने तो देखना अख़बार भी छोड़ा करता था जो याँ आने का झूटा कभी इक़रार मुद्दत से 'ज़फ़र' उस ने वो इक़रार भी छोड़ा

Bahadur Shah Zafar

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क्यूँँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर देखो ज़मीं फ़लक से फ़लक है ज़मीं से दूर परवाना वस्ल-ए-शम्अ पे देता है अपनी जाँ क्यूँँकर रहे दिल उस के रुख़-ए-आतिशीं से दूर मज़मून-ए-वस्ल-व-हिज्र जो ना में में है रक़म है हर्फ़ भी कहीं से मिले और कहीं से दूर गो तीर-ए-बे-गुमाँ है मिरे पास पर अभी जाए निकल के सीना-ए-चर्ख़-ए-बरीं से दूर वो कौन है कि जाते नहीं आप जिस के पास लेकिन हमेशा भागते हो तुम हमीं से दूर हैरान हूँ कि उस के मुक़ाबिल हो आईना जो पुर-ग़ुरूर खिंचता है माह-ए-मुबीं से दूर याँ तक अदू का पास है उन को कि बज़्म में वो बैठते भी हैं तो मिरे हम-नशीं से दूर मंज़ूर हो जो दीद तुझे दिल की आँख से पहुँचे तिरी नज़र निगह-ए-दूर-बीं से दूर दुनिया-ए-दूँ की दे न मोहब्बत ख़ुदा 'ज़फ़र' इंसाँ को फेंक दे है ये ईमान ओ दीं से दूर

Bahadur Shah Zafar

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जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ ये इश्क़ जान को मेरे कोई अज़ाब हुआ किया जो क़त्ल मुझे तुम ने ख़ूब काम किया कि मैं अज़ाब से छूटा तुम्हें सवाब हुआ कभी तो शेफ़्ता उस ने कहा कभी शैदा ग़रज़ कि रोज़ नया इक मुझे ख़िताब हुआ पि यूँँ न रश्क से ख़ूँ क्यूँँकि दम-ब-दम अपना कि साथ ग़ैर के वो आज हम-शराब हुआ तुम्हारे लब के लब-ए-जाम ने लिए बोसे लब अपने काटा किया मैं न कामयाब हुआ गली गली तिरी ख़ातिर फिरा ब-चश्म-ए-पुर-आब लगा के तुझ से दिल अपना बहुत ख़राब हुआ तिरी गली में बहाए फिरे है सैल-ए-सरिश्क हमारा कासा-ए-सर क्या हुआ हबाब हुआ जवाब-ए-ख़त के न लिखने से ये हुआ मालूम कि आज से हमें ऐ नामा-बर जवाब हुआ मँगाई थी तिरी तस्वीर दिल की तस्कीं को मुझे तो देखते ही और इज़्तिराब हुआ सितम तुम्हारे बहुत और दिन हिसाब का एक मुझे है सोच ये ही किस तरह हिसाब हुआ 'ज़फ़र' बदल के रदीफ़ और तू ग़ज़ल वो सुना कि जिस का तुझ से हर इक शे'र इंतिख़ाब हुआ

Bahadur Shah Zafar

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इतना न अपने जा में से बाहर निकल के चल दुनिया है चल-चलाव का रस्ता संभल के चल औरों के बल पे बल न कर इतना न चल निकल बल है तो बल के बल पे तू कुछ अपने बल के चल इंसां को कल का पुतला बनाया है उस ने आप और आप ही वो कहता है पुतले को कल के चल फिर आँखें भी तो दीं हैं कि रख देख कर क़दम कहता है कौन तुझ को न चल चल संभल के चल क्या चल सकेगा हम से कि पहचानते हैं हम तू लाख अपनी चाल को ज़ालिम बदल के चल है शमा' सर के बल जो मोहब्बत में गर्म हो परवाना अपने दिल से ये कहता है जल के चल बुलबुल के होश निकहत-ए-गुल की तरह उड़ा गुलशन में मेरे साथ ज़रा इत्र मल के चल गर क़स्द सू-ए-दिल है तिरा ऐ निगाह-ए-यार दो-चार तीर पैक से आगे अजल के चल जो इम्तिहान-ए-तबाह करे अपना ऐ 'ज़फ़र' तो कह दो उस को तौर पे तू इस ग़ज़ल के चल

Bahadur Shah Zafar

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भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ सुने है कौन मुसीबत कहूँ तो किस से कहूँ जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ तेरे है दिल में कुदूरत कहूँ तो किस से कहूँ न कोहकन है न मजनूँ कि थे मेरे हमदर्द मैं अपना दर्द-ए-मोहब्बत कहूँ तो किस से कहूँ दिल उस को आप दिया आप ही पशेमाँ हूँ कि सच है अपनी नदामत कहूँ तो किस से कहूँ कहूँ मैं जिस से उसे होवे सुनते ही वहशत फिर अपना क़िस्सा-ए-वहशत कहूँ तो किस से कहूँ रहा है तू ही तो ग़म-ख़्वार ऐ दिल-ए-ग़म-गीं तेरे सिवा ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहूँ तो किस से कहूँ जो दोस्त हो तो कहूँ तुझ से दोस्ती की बात तुझे तो मुझ से अदावत कहूँ तो किस से कहूँ न मुझ को कहने की ताक़त कहूँ तो क्या अहवाल न उस को सुनने की फ़ुर्सत कहूँ तो किस से कहूँ किसी को देखता इतना नहीं हक़ीक़त में 'ज़फ़र' मैं अपनी हक़ीक़त कहूँ तो किस से कहूँ

Bahadur Shah Zafar

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