ghazalKuch Alfaaz

यूँँ सजा चाँद कि झलका तिरे अंदाज़ का रंग यूँँ फ़ज़ा महकी कि बदला मिरे हमराज़ का रंग साया-ए-चश्म में हैराँ रुख़-ए-रौशन का जमाल सुर्ख़ी-ए-लब में परेशाँ तिरी आवाज़ का रंग बे-पिए हूँ कि अगर लुत्फ़ करो आख़िर-ए-शब शीशा-ए-मय में ढले सुब्ह के आग़ाज़ का रंग चंग ओ नय रंग पे थे अपने लहू के दम से दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज़ का रंग इक सुख़न और कि फिर रंग-ए-तकल्लुम तेरा हर्फ़-ए-सादा को इनायत करे ए'जाज़ का रंग

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या'नी कि इश्क़ अपना मुकम्मल नहीं हुआ गर मैं तुम्हारे हिज्र में पागल नहीं हुआ वो शख़्स सालों बा'द भी कितना हसीन है वो रंग कैनवस पे कभी डल नहीं हुआ उस गोद जैसी नींद मुयस्सर न हो सकी उतना तो मखमली कभी मख़मल नहीं हुआ दो चार राब्तों ने ही पागल किया मुझे अच्छा हुआ जो रब्त मुसलसल नहीं हुआ इस बार मेरे हाल पे खुलकर नहीं हँसी इस बार तेरे गाल पे डिंपल नहीं हुआ अंधा वो क्यूँ हुआ पता लगने के बा'द मैं ता-उम्र उस की आँख से ओझल नहीं हुआ यूँँ खींचती है तीर वो अपने निशाने पर हर इक शिकार मर गया घाइल नहीं हुआ

Kushal Dauneria

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इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले

Afkar Alvi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

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वो बुतों ने डाले हैं वसवसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया वो पड़ी हैं रोज़ क़यामतें कि ख़याल-ए-रोज़-ए-जज़ा गया जो नफ़स था ख़ार-ए-गुलू बना जो उठे थे हाथ लहू हुए वो नशात-ए-आह-ए-सहर गई वो वक़ार-ए-दस्त-ए-दुआ गया न वो रंग फ़स्ल-ए-बहार का न रविश वो अब्र-ए-बहार की जिस अदास यार थे आश्ना वो मिज़ाज-ए-बाद-ए-सबा गया जो तलब पे अहद-ए-वफ़ा किया तो वो आबरू-ए-वफ़ा गई सर-ए-आम जब हुए मुद्दई' तो सवाब-ए-सिदक़-ओ-सफ़ा गया अभी बादबान को तह रखो अभी मुज़्तरिब है रुख़-ए-हवा किसी रास्ते में है मुंतज़िर वो सुकूँ जो आ के चला गया

Faiz Ahmad Faiz

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गर्मी-ऐ-शौक़-ऐ-नज़ारा का असर तो देखो गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-तर तो देखो ऐसे नादाँ भी न थे जाँ से गुज़रने वाले नासेहो पंद-गरो राह-गुज़र तो देखो वो तो वो है तुम्हें हो जाएगी उल्फ़त मुझ से इक नज़र तुम मिरा महबूब-ए-नज़र तो देखो वो जो अब चाक गरेबाँ भी नहीं करते हैं देखने वालो कभी उन का जिगर तो देखो दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रक्खा है आओ इक दिन दिल-ए-पुर-ख़ूँ का हुनर तो देखो सुब्ह की तरह झमकता है शब-ए-ग़म का उफ़ुक़ 'फ़ैज़' ताबिंदगी-ए-दीदा-ए-तर तो देखो

Faiz Ahmad Faiz

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सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें जो तुम्हारी मान लें नासेहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें चलो आओ तुम को दिखाएँ हम जो बचा है मक़्तल-ए-शहर में ये मज़ार अहल-ए-सफ़ा के हैं ये हैं अहल-ए-सिद्क़ की तुर्बतें मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें

Faiz Ahmad Faiz

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इश्क़ मिन्नत-कश-ए-क़रार नहीं हुस्न मजबूर-ए-इंतिज़ार नहीं तेरी रंजिश की इंतिहा मालूम हसरतों का मिरी शुमार नहीं अपनी नज़रें बिखेर दे साक़ी मय ब-अंदाज़ा-ए-ख़ुमार नहीं ज़ेर-ए-लब है अभी तबस्सुम-ए-दोस्त मुंतशिर जल्वा-ए-बहार नहीं अपनी तकमील कर रहा हूँ मैं वर्ना तुझ से तो मुझ को प्यार नहीं चारा-ए-इंतिज़ार कौन करे तेरी नफ़रत भी उस्तुवार नहीं 'फ़ैज़' ज़िंदा रहें वो हैं तो सही क्या हुआ गर वफ़ा-शिआर नहीं

Faiz Ahmad Faiz

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न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया जो बचे हैं संग समेट लो तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया मिरे चारा-गर को नवेद हो सफ़-ए-दुश्मनाँ को ख़बर करो जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चुका दिया करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न मिरे क़ातिलों को गुमाँ न हो कि ग़ुरूर-ए-इश्क़ का बाँकपन पस-ए-मर्ग हम ने भुला दिया उधर एक हर्फ़ कि कुश्तनी यहाँ लाख उज़्र था गुफ़्तनी जो कहा तो सुन के उड़ा दिया जो लिखा तो पढ़ के मिटा दिया जो रुके तो कोह-ए-गिराँ थे हम जो चले तो जाँ से गुज़र गए रह-ए-यार हम ने क़दम क़दम तुझे यादगार बना दिया

Faiz Ahmad Faiz

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