"अलिफ़ लैला" थक गई रात मसकने लगा ग़ाज़ा का फ़ुसूँ सर्द पड़ने लगीं गर्दन में हमाइल बाँहें फ़र्श बिस्तर पे बिखरने लगे अफ़्शाँ के चराग़ मुज़्महिल सी नज़र आने लगीं इशरत-गाहें ज़िंदगी कितने ही वीरानों में दम तोड़ चुकी अब भी मिलती हैं मगर ग़म की फ़सुर्दा राहें जिस तरह ताक़ में जल बुझती हैं शम्ओं की क़तार ज़ुल्मत-ए-शब में जगाती हुई काशानों को बन के रह जाती है ता-सुब्ह पतंगों का मज़ार ख़ून के हर्फ़ों में तहरीर है दीवारों पर इन घिसटते हुए अज्साम के अम्बारों में दर्द के रुख़ को पलट देने का मक़्दूर नहीं फ़िक्र घबराई हुई फिरती है बाज़ारों में उम्र इक सैल-ए-अफ़ूनत है बदर-रू की मिसाल ज़ीस्त इक चा-ब-चा सड़ता हुआ गदला पानी जिस से सैराब हुआ करते हैं ख़िंज़ीर ओ शग़ाल वक़्त की जलती हुई राख से झुलसे हुए पाँव की घनी छाँव में बैठे हुए दिल कर्ब-ए-माज़ी के गिराँ बोझ से डूबी नब्ज़ें लाख चाहें पे उभरने का गुमाँ ला-हासिल एक मौहूम सी हसरत में जिए जाते हैं नाम ही नाम मसर्रत का लिए जाते हैं अपनी बे-ख़्वाब तमन्ना का फ़साना है यही कल की शब और नई और नई शब होगी ज़िंदगी होगी नई और कहानी भी नई सब्र ऐ दोस्त कि ज़ुल्मत की घड़ी बीत गई थक गई रात मसलने लगा ग़ाज़ा का फ़ुसूँ सर्द पड़ने लगीं गर्दन में हमाइल बाँहें
Related Nazm
मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
19 likes
तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
24 likes
मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
46 likes
तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
117 likes
भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
14 likes
More from Wamiq Jaunpuri
"मुदावा" कितने बेबाक हैं शाइ'र अब के कितने उर्यां हैं ये अफ़्साना-निगार कुछ समझ में मिरे आते ही नहीं इन अदब-सोज़ों के गुंजलक-अशआर यूँँ तो अपने को ये कहते हैं अदीब पढ़ते हैं जंग के लेकिन अख़बार कभी यूरोप का कभी पूरब का ज़िक्र करने में उड़ाते हैं शरार दास्तानें न क़सीदे न ग़ज़ल अदब-ए-तल्ख़ की हर सू भर मार कभी पंजाब की भोंडी बातें कभी बंगाल के गंदे अफ़्कार ख़ून-आलूदा हैं उन की नस्रें पीप बहते हुए इन के अश'आर उन के अफ़्सानों के मौज़ू अजीब काली लड़की कभी काली शलवार अन्न-दाता से कभी लड़ बैठे कभी अफ़्लास पे खींचती तलवार उन की नज़्मों में कोई लुत्फ़ नहीं न कोई नग़्मा न तफ़सीर-ए-बहार कभी आवारा कभी ख़ाना-ब-दोश कभी औरत कभी मीना-बाज़ार बद-मज़ाक़ी की सरासर बातें रंग ओ बू छोड़ के आँधी की पुकार हरफ़-ए-आख़िर की वो शमशीर दो-दम ज़हर में डूबी हुई जिस की धार जंग-ए-आज़ादी का सर में सौदा बेसवा के लिए इतने ईसार ऐब-पोशी उन्हें आती ही नहीं ज़ख़्म धोते हैं सर-ए-राहगुज़ार एक मैं भी तो हूँ पक्का शाइ'र मगर इन बातों से बिल्कुल इनकार सनद-ए-माज़ी से पुर मेरा कलाम फ़िक्र-ए-इमरोज़ से करता हूँ फ़रार होता है साफ़ मिरा हर मिसरा एक भी शे'र नहीं ज़ेहन पे बार लेकिन उस के लिए अब क्या मैं करूँँ ये समझते नहीं मुझ को फ़नकार इंक़िलाब और अदब-हा-ए-ग़ज़ब कितने मख़दूश हैं ये सब आसार गोर्की जाबिर ओ नज़्र-उल-इस्लाम यही दो चार हैं इन के मेआ'र सुनने में आया है बहरे मिरे कान कि ख़ुदा से भी उन्हें है इनकार मज़हबों से उन्हें बेहद नफ़रत माबदों पर ये उड़ाते हैं ग़ुबार हुक्मरानों का कोई ख़ौफ़ नहीं उमरा का नहीं कुछ दिल में वक़ार चाँद पर ख़ाक उड़ाने के लिए जब भी देखा उन्हें पाया तय्यार मुख़्तसर ये कि हर इक फ़ेल उन का शोला-दर-क़स्र शिकन-दर-दीवार मैं तो आजिज़ हूँ इलाही तौबा आख़िर आएगा कभी उन को क़रार कोई लिल्लाह हटाओ उन को जाग उट्ठे हैं सुलाओ उन को
Wamiq Jaunpuri
0 likes
"जश्न-ए-नौशीन" घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़ फ़लक से फ़र्श-ए-ज़मीं पर बरस रहा है नूर छतों पे खेतों पे शाख़ों पे बस रहा है नूर चमन है नूर की इक नाव गिर रही है बर्फ़ फ़ज़ा में चारों तरफ़ सुरमई उजाला है थी बूँद पानी की अब रुई का जो गाला है दिलों को शौक़ से गर्माओ गिर रही है बर्फ़ है नर्म ऐसी कि फूलों को गुदगुदी आए सफ़ेद ऐसी कि बगुले का पर भी शरमाए मिला के गुड़ में इसे खाओ गिर रही है बर्फ़ बनाओ क़ौस-ए-क़ुज़ह बर्फ़ पर गिरा कर रंग बढ़ाओ बर्फ़ के खेलों से अपने दिल की उमंग फिसल के बर्फ़ पे दिखलाओ गिर रही है बर्फ़ तराशो बर्फ़ के पुतले मनाओ यख़ की बहार उछालो बर्फ़ की गेंदें उड़ाओ यख़ की फुवार चलो कि पार्क में बे-भाव गिर रही है बर्फ़ घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़
Wamiq Jaunpuri
0 likes
"कार्ल मार्क्स" मार्क्स के इल्म ओ फ़तानत का नहीं कोई जवाब कौन उस के दर्क से होता नहीं है फ़ैज़-याब उस की दानाई का हासिल नाख़ुन-ए-उक़्दा-कुशा ताबनाकी-ए-ज़मीर-ओ-ज़ीरकी का आफ़्ताब चाहने वालों का उस की ज़िक्र ही क्या कीजिए उस के दुश्मन भी सिरहाने रखते हैं उस की किताब माद्दी तारीख़-ए-आलम जिस की तालीफ़-ए-अज़ीम तास कैपिटाल है या ज़ीस्त का लुब्ब-ए-लुबाब पढ़ के जिस के हो गईं हुश्यार अक़वाम-ए-ग़ुलाम इश्तिराकी फ़ल्सफ़ा का खुल गया हर दिल में बाब कितने दोज़ख़ उस के इक मंशूर से जन्नत बने कितने सहराओं को जिस ने कर दिया शहर-ए-गुलाब मार्क्स ने साइंस ओ इंसाँ को किया है हम-कनार ज़ेहन को बख़्शा शुऊर-ए-ज़िंदगानी का निसाब उस की बींनिश उस की वज्दानी-निगाह-ए-हक़-शनास कर गई जो चेहरा-ए-इफ़्लास-ए-ज़र को बे-नक़ाब 'ग़सब'-ए-उजरत को दिया 'सरमाया' का जिस ने लक़ब बे-हिसाब उस की बसीरत उस की मंतिक़ ला-जवाब आफ़्ताब ताज़ा की उस ने बशारत दी हमें उस की हर पेशन-गोई है बरफ़्गंदा नक़ाब कोई क़ुव्वत उस की सद्द-ए-राह बन सकती नहीं वक़्त का फ़रमान जब आता है बन कर इंक़िलाब अहल-ए-दानिश का रजज़ और सीना-ए-दहक़ाँ की ढाल लश्कर मज़दूर के हैं हम-सफ़ीर ओ हम-रिकाब काटती है सेहर-ए-सुल्तानी को जब मूसा की ज़र्ब सतवत-ए-फ़िरऔन हो जाती है अज़ ख़ुद ग़र्क़-ए-आब आज की फ़िरऔनियत भी कुछ इसी अंदाज़ से रफ़्ता रफ़्ता होती जाएगी शिकार-ए-इंक़िलाब लड़ रहा है जंग आख़िर कीसा-ए-सरमाया-दार जौहरी हथियार से करता नहीं जो इज्तिनाब अपने मुस्तक़बिल से ताग़ूती तमद्दुन को है यास दीदनी है दुश्मन-ए-इंसानियत का इज़्तिराब हज़रत-ए-इक़बाल का इब्लीस-ए-कोचक ख़ौफ़ से लरज़ा-बर-अंदाम यूँँ शैताँ से करता है ख़िताब पंडित ओ मुल्ला ओ राहिब बे-ज़रर ठहरे मगर टूटने वाला है तुझ पर इक यहूदी का इताब वो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीब नीस्त पैग़म्बर ओ लेकिन दर बग़ल दारद किताब
Wamiq Jaunpuri
0 likes
"ख़ूनी क़िला" बहुत ही सख़्त बहुत ही तवील है ये घड़ी इस अहद-ए-क़हक़री का हर क़दम है एक सदी ये अहद जिस पे कई नस्लों की है गर्द पड़ी ये पीर-ज़ाल ये क़िला कनार आब-ए-रवाँ भड़कते शोलों के मानिंद जिस का हर गुम्बद ये कंगरे हैं कि हैं भट्टियों के अँगारे जला के रख दिए जिन की तपिश ने लाखों मकाँ ये है अलामत-ए-फ़िस्ताइयत गिराओ से हमारे बच्चों के स्कूल से हटाओ इसे ये ख़ूनी-क़िला का फाटक है या दहान-ए-जहीम फ़सील-ए-संग इबारत है ख़ूँ के धब्बों से दिए लहूँ के फ़रोज़ाँ किए हुए हर ताक़ है जिन के सामने ख़ीरा तला ओ गौहर ओ सीम सदा-ए-रक़्स निकलती हुई झरोंकों से किसी हसीना-ए-फ़िरऔन का महल जैसे सुतून मरमरीं अँगड़ाई ले के नींद में चूर लिबास-ए-बरहनगी में निहाँ क़लो-पत्रा मियान-ए-नील कोई लाश देख कर हँस दे इस अहद-ए-क़हक़री का हर क़दम है एक सदी बहुत ही सख़्त बहुत ही तवील है ये घड़ी नद्दी ये है कि ज़मीं पर है एक लाश पड़ी
Wamiq Jaunpuri
0 likes
"सूखे हुए बेले" तुम ने सूखे हुए बेले भी कभी सूँघे हैं इन को मसला न करो कितनी आज़ुर्दा मगर भीनी महक देते हैं इन को फेंका न करो गर्द-आलूद बुझे चेहरों को समझा भी करो सिर्फ़ देखा न करो हाथ के छालों का गट्ठों का मुदावा भी करो सिर्फ़ छेड़ा न करो तुम ने सूखे हुए बेले भी कभी सूँघे हैं
Wamiq Jaunpuri
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Wamiq Jaunpuri.
Similar Moods
More moods that pair well with Wamiq Jaunpuri's nazm.







