पाकिस्तान के सारे शहरो ज़िंदा रहो पाइंदा रहो रौशनियों रंगों की लहरो ज़िंदा रहो पाइंदा रहो बातिल से तुम कभी न डरना ज़ुल्म कभी मंज़ूर न करना अज़्मत-ओ-हैबत की दीवारो ज़िंदा रहो पाइंदा रहो अक्स पड़ें जिस जगह तुम्हारे चमकें ज़मीनें उन की ज़िया से मेरे वतन के चाँद सितारो ज़िंदा रहो पाइंदा रहो मौसम आएँ गुज़रते जाएँ तुम पर रंग बरसते जाएँ अर्ज़-ए-ख़ुदा पे महकते बाग़ो ज़िंदा रहो पाइंदा रहो हक़ की रज़ा है साथ तुम्हारे मेरी वफ़ा है साथ तुम्हारे नए उजालों के सर-चश्मो ज़िंदा रहो पाइंदा रहो
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??
Shadab Javed
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"ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा" प्यार से बहुत दिल से बनाया होगा यार बड़ी मुश्किल से बनाया होगा चाँद को इंसान में तब्दील किया कैसे ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा इक मुद्दत लगी होगी तेरी आँखें बनाने में कई अरसों में जाके तेरा चेहरा बना होगा ख़ूबसूरती समेटी होगी सारे जहाँ से उस ने तब कहीं जाके तेरा लहजा बना होगा तेरी ज़ुल्फ़ बनाने में कितनी रातें लगी होंगी तेरा जिस्म कितने ही गुलाबों से बनाया होगा सँवारा होगा जन्नत की परियों ने तुझे तेरा नक़्श कितने ही हिसाबों से बनाया होगा कितने मैख़ाने ख़ाली किए होंगे आँखों में तेरी तेरा दिल कितने ही हीरों से बनाया होगा शब-ओ-रोज़ अब यही सोचते गुज़रते हैं मेरे के यार ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा ज़रूर तारों से सलाह ली होगी बादलों की निगरानी में रखा होगा तुझे तो ज़मीन पे भेजा ख़ुदा ने पर तेरा बाल तेरी निशानी में रखा होगा ख़ुद रहगुज़र भी राह देखती है तेरी फूल तेरे छूने पे महकते हैं तेरे इशारे पे सहर होती है परिंदे तेरी आहट पे चहकते हैं आईना तेरे अक्स पे इतराता है जुगनू देखते हैं तेरे ख़्वाब रात भर तेरी ख़ुशबू की दस्तरस में क्या आया के 'आकर्ष' अब कोसता है गुलाब रात भार बेशुमार शिद्दत से तेरी रूह बनाई होगी तेरा हुस्न सादगी से ख़फ़ा हो के बनाया होगा इक बदन में काइनात क़ैद करी कैसे ख़ुदा ने तुझे कैसे बनाया होगा
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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सदाक़त-ए-इश्क़ इश्क़ की तुम हक़ीक़त समझ लो इस को ग़म से गुज़रना पड़ेगा उन की यादों में मसरूफ़ हो तुम उन की यादों में रहना पड़ेगा दर्द-ए-दिल अपना तुझ को सुनाऊँ जी तो करता है तुझ को सुनाऊँ तेरी आँखों से कह देंगी आँसू अब मुझे भी निकलना पड़ेगा अपने भी रूठ जाएँगे तेरे रिश्ते भी छूट जाएँगे तेरे लोग तुझ को कहेंगे निकम्मा ऐसा लम्हा भी सहना पड़ेगा तू भरोसा भी करता है जिस पे बे-वजह होगा नाराज़ तुझ से होता अक्सर यहाँ ऐसा आशिक़ इश्क़ से हाँ मुकरना पड़ेगा वो तुझे भूल जाएँगे ऐसे जाने ज़िंदा रहेगा तू कैसे मशवरा बस यही देगा 'दानिश' अलविदा तुझ को कहना पड़ेगा
Danish Balliavi
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"मैं ने उस सेे सीखा है" एक ज़माना ऐसा था मैं रूठा रूठा रहता था अब तो लहजा मीठा है मैं ग़ुस्सा ग़ुस्सा रहता था एक घुटन सी रहती थी जज़्बात नहीं बहते थे जिन आँखों में अब नूर है इन में दरिया बहता था यक़ीं न होता था मुझ को और किसी की बातों पर लोगों से तो अब मिलता हूँ तन्हा तन्हा रहता था दिल के सारे दरवाज़े मैं ने अंदर से बंद किए थे एक दरीचा मगर खुला रह गया था मुझ से और उसी से वो अंदर आया और उस ने ला-इल्मी ही सब के सब दरवाज़े खोल दिए तुम हॅंसते मुस्कुराते रहना दिल की बातें खुल के कहना मैं जो कोई रोज़ चली भी जाऊॅं अपने आप से मिलते रहना और उस ने ये जाते वक़्त कहा था कि नाज़ ज़िंदगी खुल के जीना तुम में और मुझ में बस फ़र्क इतना है तुम को शायद आता था मैं ने उस सेे सीखा है
Naaz ishq
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तुम्हारे हैं कहो इक दिन कहो इक दिन कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है कहो इक दिन जिसे तुम चाँद सा कहते हो वो चेहरा तुम्हारा था सितारा सी जिन्हें कहते हो वो आँखें तुम्हारी हैं जिन्हें तुम शाख़ सी कहते हो वो बाँहें तुम्हारी हैं कबूतर तोलते हैं पर तो परवाज़ें तुम्हारी हैं जिन्हें तुम फूल सी कहते हो वो बातें तुम्हारी हैं क़यामत सी जिन्हें कहते हो रफ़्तारें तुम्हारी हैं कहो इक दिन कहो इक दिन कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है अगर सब कुछ ये मेरा है तो सब कुछ बख़्श दो इक दिन वजूद अपना मुझे दे दो मोहब्बत बख़्श दो इक दिन मिरे होंटों पे अपने होंट रख कर रूह मेरी खींच लो इक दिन
Obaidullah Aleem
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मुझे ख़बर है तुम्हारी आँखों में जो छुपा है तुम्हारे चेहरे पे जो लिखा है लहू जो हर आन बोलता है मुझे बता दो और अपने दुख से नजात पा लो
Obaidullah Aleem
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सब बारिशें हो के थम चुकी थीं रूहों में धनक उतर रही थी मैं ख़्वाब में बात कर रहा था वो नींद में प्यार कर रही थी अहवाल ही और हो रहे थे लज़्ज़त में विसाल रो रहे थे बोसों में धुले-धुलाए दोनों नश्शे में लिपट के सो रहे थे छोटा सा हसीन सा वो कमरा इक आलम-ए-ख़्वाब हो रहा था ख़ुश्बू से गुलाब हो रहा था मस्ती से शराब हो रहा था वो छाँव सा चाँदनी सा बिस्तर हम रंग नहा रहे थे जिस पर यूँँ था कि हम अपनी ज़ात के अंदर थे अपना ही एक और मंज़र सैराब मोहब्बतों के धारे बाहम थे वजूद के किनारे मौज़ू-ए-सुख़न, सुख़न थे सारे आलम ही अजीब थे हमारे जागे वो लहू में सिलसिले फिर तन मन के वही थे ज़ाइक़े फिर थम थम के बरस बरस गए फिर पाताल तक हो गए हरे फिर जारी था वो रक़्स-ए-हम-किनारी निकली नई सुब्ह की सवारी ऐसा लगा काएनात सारी इस आन तो है फ़क़त हमारी जब चाँद मिरा नहा के निकला मैं दिल को दिया बना के निकला कश्कोल-ए-दुआ उठा के निकला शाइ'र था सदा लगा के निकला दरिया वो समुंदरों से गहरे वो ख़्वाब गुलाब ऐसे चेहरे सब ज़ावियों हो गए सुनहरे आईनों में जब वो आ के ठहरे
Obaidullah Aleem
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मेरी आँखों में कोई चेहरा चराग़-ए-आरज़ू वो मेरा आईना जिस से ख़ुद झलक जाऊँ कभी ऐसा मौसम जैसे मय पी कर छलक जाऊँ कभी या कोई है ख़्वाब जो देखा था लेकिन फिर मुझे याद करने पर भी याद आया न था दिल ये कहता है वही है हू-ब-हू जिस को देखा था कभी और सामने पाया न था गुफ़्तुगू उस से है और है रू-ब-रू ख़्वाब हो जाए न लेकिन गुफ़्तुगू मेरी आँखों में कोई चेहरा चराग़-ए-आरज़ू
Obaidullah Aleem
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मिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ ये मेरा चेहरा ये मेरी आँखें बुझे हुए से चराग़ जैसे जो फिर से चलने के मुंतज़िर हों वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें जिन्हों ने पैमाँ किए थे मुझ से रफ़ाक़तों के मोहब्बतों के कहा था मुझ से कि ऐ मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा के जहाँ भी जाएगा हम भी आएँगे साथ तेरे बनेंगे रातों में चाँदनी हम तो दिन में साए बिखेर देंगे वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें वो अपने पैमाँ रफ़ाक़तों के मोहब्बतों के शिकस्त कर के न जाने अब किस की रहगुज़र का मनारा-ए-रौशनी हुए हैं मगर मुसाफ़िर को क्या ख़बर है वो चाँद-चेहरा तो बुझ गया है सितारा-आँखें तो सो गई हैं वो ज़ुल्फ़ें बे-साया हो गई हैं वो रौशनी और वो साए मिरी अता थे सो मेरी राहों में आज भी हैं कि मैं मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा का वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें हज़ारों चेहरों हज़ारों आँखों हज़ारों ज़ुल्फ़ों का एक सैलाब-ए-तुंद ले कर मिरे तआक़ुब में आ रहे हैं हर एक चेहरा है चाँद-चेहरा हैं सारी आँखें सितारा-आँखें तमाम हैं मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें मैं किस को चाहूँ मैं किस को चूमूँ मैं किस के साए में बैठ जाऊँ बचूँ कि तूफ़ाँ में डूब जाऊँ न मेरा चेहरा न मेरी आँखें मिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ
Obaidullah Aleem
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