nazmKuch Alfaaz

आख़िरी बार कोह-ए-निदा के उस पार उस के सुनहरी वजूद की आयत मेरे दिल के क़िर्तास पर तसतीर होई मैं सात सवालों के जवाब तलाश करता हुआ इस अजनबी सर-ज़मीन पर उतरा था उस की सुनहरी नाफ़ का प्याला ख़ुतन से आई कस्तूरी से लबरेज़ था और सीने पर लाला के दो फूल खिले थे रौशनी उस के चेहरे के ख़द्द-ओ-ख़ाल तख़्लीक़ करने में मसरूफ़ थी वो सियाह पैरहन पहने हीरे के तख़्त को ठोकर पे लिए बैठी थी उस के पहलू में वफ़ादार ग़ुलाम ईस्तादा थे जिन के मोहब्बत से लबरेज़ दिल उन की हथेलियों पे धड़कते थे मैं ने अपनी ताज़ा नज़्म संदल की छाल पर लिख कर उसे हदिया की मेरी नज़्म के आख़िरी मिसरे तक आते आते उस का दिल आँखों से बह निकला उस ने हाथ बढ़ा कर रक़्स करते पेड़ का सब से ख़ुश-गुलू परिंदा तोड़ कर मेरी हथेली पर रखा तो उस के पहलू में ठाठें मारता जवाहरात का दरिया मेरे कुशादा दामन में बहने लगा मैं ने उस के दरिया को अपने चुल्लू में भरा और फ़र्श पर थूक दिया तब उस पर ये राज़ खुला कि मैं ही वो शाइ'र हूँ जिस ने नज़्म और तक़दीर ईजाद की

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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अशतार ऐ आसमानों की मलिका बादशाह तेरी दहलीज़ का दरबान है लगाश और और अर्ज में तेरे नाम का सिक्का ढलता है तेरी ज़ुल्फ़ें ज़फ़र-मंद लश्कर का फरेरा हैं और चेहरा सुब्ह के मशरिक़ का आसमान फ़ुरात का चमकता पानी तेरा आईना है कुँवारियाँ तेरे मुक़द्दस अहाते में अपनी इस्मत का सुनहरा सिक्का भेंट करने आती हैं तो मीनारा-ए-बाबुल की बुलंदी से बाँझ ज़मीन के नाम बार-आवरी का संदेसा लिखती है ऐ बहुत से नामों वाली तेरी हथेलियाँ तेरे तमव्वुज़ के हाथों की गर्मी से दहकती हैं जिस के सफ़ेद मा'बद के सुनहरी कलस मेरी आँखों को ख़ीरा करते हैं तेरे मातम-दारों के आज़ा-ए-तनासुल तेरी बारगाह का चढ़ावा हैं अज़दहा तेरे पाँव के तवाज़ुन पे मरता है सफ़ेद शे'र तेरे सुनहरे रथ के घोड़े हैं तेरे सर पर पर-दार बेल का साया है ऐ बार-आवरी की देवी तेरे क़दमों की आहट से मुर्दा ज़मीन नाफ़ तक धड़क उठती है

Jawaz Jafri

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चौथी बार बंगाल की गाती नदिया के किनारे वो मुझ पर मुन्कशिफ़ होई जहाँ सुनहरी मछलियाँ नीले सुरों को बिलोती थीं और रौशनी बाँटते पेड़ कलाम करते थे उस की सहर फूँकती आँख ने मुझे परिंदा बनने का हुक्म दिया मैं उस के शाने की हरी शाख़ पर बैठ कर अपना लहन ईजाद करने लगा उस के हरे बदन का साया सिवा नेज़े पे था मैं ने उस के बदन के साए से नर्म बिछौना तख़्लीक़ किया और दुनिया के चेहरे पर थूक दिया एक तवील नींद के बा'द मैं ने ब्रह्मा की तरह आँख खोली उस का घना साया मेरे वजूद पर सिमट रहा था उस के लज़ीज़ फलों में मेरे लिए कड़वाहट रेंगने लगी मैं ने अपना रेज़ा रेज़ा वजूद समेट कर गठड़ी में बाँधा क़ुतुब-नुमा को ख़लीज बंगाल के ख़त पर रख कर पाँव से ठोकर मारी और हवा पर पाँव रखता हुआ पाँचवें सम्त में आगे बढ़ गया मैं ने अपने दिल को यक़ीन दिलाया कि उस की सिसकियों का मुख़ातब मैं नहीं था

Jawaz Jafri

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मैं ने दजला-ओ-फ़ुरात के मशरिक़ में एक क़दीम और रौशन पेड़ के नीचे सज्दों का ख़िराज वसूल किया और फलदार दरख़्तों से ढके बाग़ में मुक़ीम हवा जिसे मेरे और उस औरत के लिए आरास्ता किया गया था जिस की जन्म-भूमि मेरी दाईं पस्ली थी मैं ने पहली बार उसे ज़िंदगी के पेड़ की सुनहरी शाख़ों के दरमियान रेंगते देखा वो पेड़ की हिफ़ाज़त पे मामूर था उस की कासनी आँखों में क़ाइल कर लेने वाली चमक थी मैं ने अपनी भूक इम्तिनाअ के फल पे तस्तीर की तो मेरी आँखें उस औरत के जिस्म के आर-पार देखने लगीं और बाग़ के सब्ज़ पेड़ मेरे सर से अपने साए की छतरियाँ समेटने लगे मैं ने ज़िंदगी के पेड़ से लिपटे अज़दहे को तीन बराबर हिस्सों में तक़्सीम किया एक हिस्से से अपने सर के लिए शिमला ईजाद किया दूसरे हिस्से को इज़ार-बंद बना कर कमर के गिर्द लपेटा जो बच रहा उसे अपनी साथी औरत के बालों में गूँधा और बाग़ की जानिब पीठ कर ली मेरी औरत ने मुझ से छुप कर उस की सियाह जल्द से अपनी नीली आँखों के लिए सुर्मा ईजाद किया और रात के पिछले पहर अपने दूध से उस की ज़ियाफ़त करने लगी मैं ने मुक़द्दस पहाड़ की सब से बुलंद चोटी उसे दान की और अपनी पेशानी ख़ाक पे रख दी

Jawaz Jafri

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सातवीं बार असकंदरिया के नीले साहिल पर उस ने अपनी दीद का सुनहरा सिक्का मेरे कानों के कश्कोल में दान किया असकंदरिया जिसे एक बहादुर जंग-जू ने आबाद किया था जो हँसते बस्ते शहरों के नाम बर्बादी के संदेसे लिखता था उस का नसीब बूढे मल्लाह की बोसीदा कश्ती से बँधा हचकोले ले रहा था दुनिया का नसीब लिखने वाले उस के साँवले हाथों में शुमाली मिस्र के सरसब्ज़ बाग़ों के अव्वलीन फल थे जिसे वो बोटो शहर के सब से क़दीम दारुल-इस्तिख़ारा को भेंट करने आई थी

Jawaz Jafri

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रात के आख़िरी पहर मैं ने मुक़द्दस फ़्लाई की सरहद पे पाँव रखा उस के सब्ज़ पैरहन की ख़ुश्बू मेरे इस्तिक़बाल के लिए मौजूद थी मेरे ख़ाक-आलूद घुटनों ने ज़मीन की खुशबू-दार नाफ़ को छुआ तो मैं ने अपना मल्बूस चाक कर डाला वो पेपर्स के जंगलों के शुमाली किनारे पे बैठी नील के पानियों को कात रही थी उस ने मेरे ख़ाक-आलूद चेहरे को नील का आईना दिखाया हम मुतबर्रिक तेल के नमकीन चराग़ हथेलियों पे रखे शहर-ए-पनाह की तरफ़ चल दिए जहाँ देवता बारयाबी के मुंतज़िर थे हमारे क़दमों की आहट पा कर मुक़द्दस फाटक के सुनहरे किवाड़ ज़मीन के आख़िरी किनारों तक खुल गए और शहर की इत्र-बेज़ गलियाँ हमारे तलवे चूमने लगीं हमारे सुरों पे फैले आसमान के सफ़ेद वरक़ पर परिंदों के लिए हर्फ़ इम्तिनाअ लिखा था हम ख़ुदावंद असर की ज़ियारत-गाह के नवाह में पहुँचे तो देवता अपना मरक़द छोड़ कर दहलीज़ से आ लगा उस ने अपने दिल के छेद नरसले की शाख़ पे कुंदा किए और अपने ख़ूब-सूरत लहन की सीढ़ी लगा कर दिलों में उतर गया सियाह मा'बद के सुनहरे कलस के साए में ज़ाएरीन का मातमी जुलूस दर-ओ-दीवार पे नौहे तसतीर कर रहा था मेरे पहलू में खड़ी सब्ज़-फ़ाम औरत ने मुझे देवताई मल्बूस हदिया किया तो मैं हातिफ़ की बारगाह की दहलीज़ से लग कर अपना क़सीदा भेंट करने लगा मुक़द्दस फ़्लाई की तारीक गलियाँ नमकीन चराग़ों से भर गईं मैं ने आख़िरी मिस्रा हातिफ़ को दान किया और सब्ज़ औरत की नीली आँखों में तहसीन की नक़दी तलाश करने लगा उस ने फ़स्लों पे करम करते हाथ से हवा में तराज़ू बनाया एक पलड़े में मेरा हर्फ़-ए-हुनर रखा और दूसरे में अपने जमाल की नक़दी उस के जमाल का सब्ज़ दरिया मेरे दामन में बहने लगा

Jawaz Jafri

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