nazmKuch Alfaaz

एक गर्दन पे सैकड़ों चेहरे और हर चेहरे पर हज़ारों दाग़ और हर दाग़ बंद दरवाज़ा रौशनी इन से आ नहीं सकती रौशनी इन से जा नहीं सकती तंग सीना है हौज़ मस्जिद का दिल वो दूना पुजारियों के ब'अद चाटते रहते हैं जिसे कुत्ते कुत्ते दूना जो चाट लेते हैं देवताओं को काट लेते हैं जाने किस कोख ने जना इस को जाने किस सेहन में जवान हुई जाने किस देस से चली कम-बख़्त वैसे ये हर ज़बान बोलती है ज़ख़्म खिड़की की तरह खोलती है और कहती है झाँक कर दिल में तेरा मज़हब, तिरा अज़ीम ख़ुदा तेरी तहज़ीब के हसीन सनम सब को ख़तरे ने आज घेरा है ब'अद उन के जहाँ अँधेरा है सर्द हो जाता है लहू मेरा बंद हो जाती हैं खुली आँखें ऐसा लगता है जैसे दुनिया में सभी दुश्मन हैं कोई दोस्त नहीं मुझ को ज़िंदा निगल रही है ज़मीं ऐसा लगता है राक्षस कोई एक गागर कमर में लटका कर आसमाँ पर चढ़ेगा आख़िर-ए-शब नूर सारा निचोड़ लाएगा मेरे तारे भी तोड़ लाएगा ये जो धरती का फट गया सीना और बाहर निकल पड़े हैं जुलूस मुझ से कहते हैं तुम हमारे हो मैं अगर इन का हूँ तो मैं क्या हूँ मैं किसी का नहीं हूँ अपना हूँ मुझ को तंहाई ने दिया है जनम मेरा सब कुछ अकेले-पन से है कौन पूछेगा मुझ को मेले में साथ जिस दिन क़दम बढ़ाउँगा चाल मैं अपनी भूल जाऊँगा ये और ऐसे ही चंद और सवाल ढूँडने पर भी आज तक मुझ को जिन के माँ बाप का मिला न सुराग़ ज़ेहन में ये उंडेल देती है मुझ को मुट्ठी में भेंच लेती है चाहता हूँ कि क़त्ल कर दूँ इसे वार लेकिन जब इस पे करता हूँ मेरे सीने पे ज़ख़्म उभरते हैं मेरे माथे से ख़ूँ टपकता है जाने क्या मेरा इस का रिश्ता है आँधियों में अज़ान दी मैं ने संख फूँका अँधेरी रातों में घर के बाहर सलीब लटकाई एक इक दर से उस को ठुकराया शहर से दूर जा के फेंक आया और एलान कर दिया कि उठो बर्फ़ सी जम गई है सीनों में गर्म बोसों से उस को पिघला दो कर लो जो भी गुनाह वो कम है आज की रात जश्न-ए-आदम है ये मिरी आस्तीन से निकली रख दिया दौड़ के चराग़ पे हाथ मल दिया फिर अँधेरा चेहरे पर होंट से दिल की बात लौट गई दर तक आ के बरात लौट गई उस ने मुझ को अलग बुला के कहा आज की ज़िंदगी का नाम है ख़ौफ़ ख़ौफ़ ही वो ज़मीन है जिस में फ़िरक़े उगते हैं फ़िरक़े पलते हैं धारे सागर से कट के चलते हैं ख़ौफ़ जब तक दिलों में बाक़ी है सिर्फ़ चेहरा बदलते रहना है सिर्फ़ लहजा बदलते रहना है कोई मुझ को मिटा नहीं सकता जश्न-ए-आदम मना नहीं सकता

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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

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'हमारी बे-वफ़ा हम सफ़र' बे-सबब प्यार करते हैं तुझ से हम ने ये भी जताया नहीं है कब से तू ने निकाला है दिल से तू ने अब तक बताया नहीं है अपने चेहरे से चिलमन हटा ले हम ने जी भर के देखा नहीं है प्यार होगा मुकम्मल ये कैसे साथ तू ने निभाया नहीं है हम तेरे हैं तेरे ही रहेंगे तू ने अपना ही समझा नहीं है हम तो मजनूँ हुए तेरी ख़ातिर तुझ को हम ने सताया नहीं है प्यार के तोहफ़े हम ने जो दी हैं तू ने उस को भी रक्खा नहीं है रंजिशों में ही छोड़ा है तू ने हम ने मातम मनाया नहीं है बे-वफ़ा तू है 'दानिश' के दिल में तेरे दिल में क्यूँ 'दानिश' नहीं है तेरी ख़ातिर ये जाँ भी है हाज़िर तुझ को जुमला सुनाया नहीं है

Danish Balliavi

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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा

ALI ZUHRI

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कमाल कर गया सावन का महीना ,वो चलती सुहानी हवा। और उस हवा में उड़ते गुलाबी दुपट्टे, और लहराते घुंगराले भूरे बालों के बीच, स झांँकता वो ख़ूब-सूरत रूहानी चेहरा, और उस श्यामल देशी चेहरे पर, बड़ी सदाकत और नज़ाकत के साथ सजे, उन मखमली गुलाबी होंठों का, हौले से ये कहना... अजी! सुनते हो! कमाल कर गया

Alankrat Srivastava

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नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठना मिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना ये गुफ़्तुगू गुफ़्तुगू नहीं है बिगड़ने बनने का मरहला है धड़क रहा है फ़ज़ा का सीना कि ज़िंदगी का मुआमला है ख़िज़ाँ रहे या बहार आए तुम्हारे हाथों में फ़ैसला है न चैन बे-ताब बिजलियों को न मुतमइन कारवान-ए-शबनम कभी शगूफ़ों के गर्म तेवर कभी गुलों का मिज़ाज बरहम शगूफ़ा ओ गुल के इस तसादुम में गुल्सिताँ बन गया जहन्नम सजा लें सब अपनी अपनी जन्नत अब ऐसे ख़ाके बना के उठना ख़ज़ाना-ए-रंग-ओ-नूर तारीक रहगुज़ारों में लुट रहा है उरूस-ए-गुल का ग़ुरूर-ए-इस्मत सियाहकारों में लुट रहा है तमाम सरमाया-ए-लताफ़त ज़लील ख़ारों में लुट रहा है घुटी घुटी हैं नुमू की साँसें छुटी छुटी नब्ज़-ए-गुलिस्ताँ है हैं गुरसना फूल, तिश्ना ग़ुंचे, रुख़ों पे ज़र्दी लबों पे जाँ है असीर हैं हम-सफ़ीर जब से ख़िज़ाँ चमन में रवाँ-दवाँ है इस इंतिशार-ए-चमन की सौगंद बाब-ए-ज़िंदाँ हिला के उठना हयात-ए-गीती की आज बदली हुई निगाहें हैं इंक़िलाबी उफ़ुक़ से किरनें उतर रही हैं बिखेरती नूर-ए-कामयाबी नई सहर चाहती है ख़्वाबों की बज़्म में इज़्न-ए-बारयाबी ये तीरगी का हुजूम कब तक ये यास का अज़दहाम कब तक निफ़ाक़ ओ ग़फ़लत की आड़ ले कर जियेगा मुर्दा निज़ाम कब तक रहेंगे हिन्दी असीर कब तक रहेगा भारत ग़ुलाम कब तक गले का तौक़ आ रहे क़दम पर कुछ इस तरह तिलमिला के उठना

Kaifi Azmi

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मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ को हवाओं में लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझ को क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे कि आवाज़ दे कर बुला लेगी मुझ को मगर उस ने रोका न मुझ को मनाया न दामन ही पकड़ा न मुझ को बिठाया न आवाज़ ही दी न मुझ को बुलाया मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया यहाँ तक कि उस से जुदा हो गया मैं

Kaifi Azmi

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ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुई पत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुई मौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश है शाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश है चंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुए जैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुए खप गया है यूँँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंग जिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंग उमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिए या चली है बाल खोले राँड रोने के लिए जितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान है हर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान है इक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहीं चिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहीं सो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँ हो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँ हाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागर ले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम कर दिल सँभलता ही नहीं है सीना-ए-सद-चाक में फूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक में उड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआर हो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशार हसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश में सैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश में उम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिए बार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिए चाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहीं हाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहीं थरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़र ले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सर जब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँ आह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँ हो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराम मुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवाम दोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गया प्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गया ले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरार आग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रार पड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभी उँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभी आ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईं और कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईं इतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहीं यास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहीं आ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूक फट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूक अपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद है ऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद है बाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहार ख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकार जब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथ ज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथ दिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़ चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़ दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगी ये नहीं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगी वाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोई चाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोई वाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैं रहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैं दिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गया हाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गया तिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफती पी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपती मौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गए साँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गए आँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गई मौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गई और कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दाम ऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम

Kaifi Azmi

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ऐ हमा-रंग हमा-नूर हमा-सोज़-ओ-गुदाज़ बज़्म-ए-महताब से आने की ज़रूरत क्या थी तू जहाँ थी उसी जन्नत में निखरता तिरा रूप इस जहन्नम को बसाने की ज़रूरत क्या थी ये ख़द-ओ-ख़ाल ये ख़्वाबों से तराशा हुआ जिस्म और दिल जिस पे ख़द-ओ-ख़ाल की नर्मी भी निसार ख़ार ही ख़ार शरारे ही शरारे हैं यहाँ और थम थम के उठा पाँव बहारों की बहार तिश्नगी ज़हर भी पी जाती है अमृत की तरह जाने किस जाम पे रुक जाए निगाह-ए-मासूम डूबते देखा है जिन आँखों में मय-ख़ाना भी प्यास उन आँखों की बुझे या न बुझे क्या मालूम हैं सभी हुस्न-परस्त अहल-ए-नज़र साहिब-ए-दिल कोई घर में कोई महफ़िल में सजाएगा तुझे तू फ़क़त जिस्म नहीं शे'र भी है गीत भी है कौन अश्कों की घनी छाँव में गाएगा तुझे तुझ से इक दर्द का रिश्ता भी है बस प्यार नहीं अपने आँचल पे मुझे अश्क बहा लेने दे तू जहाँ जाती है जा, रोकने वाला मैं कौन अपने रस्ते में मगर शम्अ' जला लेने दे

Kaifi Azmi

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ये बरसात ये मौसम-ए-शादमानी ख़स-ओ-ख़ार पर फट पड़ी है जवानी भड़कता है रह रह के सोज़-ए-मोहब्बत झमाझम बरसता है पुर-शोर पानी फ़ज़ा झूमती है घटा झूमती है दरख़्तों को ज़ौ बर्क़ की चूमती है थिरकते हुए अब्र का जज़्ब तौबा कि दामन उठाए ज़मीं घूमती है कड़कती है बिजली चमकती हैं बूँदें लपकता है कौंदा दमकती हैं बूँदें रग-ए-जाँ पे रह रह के लगती हैं चोटें छमा-छम ख़ला में खनकती हैं बूँदें फ़लक गा रहा है ज़मीं गा रही है कलेजे में हर लय चुभी जा रही है मुझे पा के इस मस्त शब में अकेला ये रंगीं घटा तीर बरसा रही है चमकता है बुझता है थर्रा रहा है भटकने की जुगनू सज़ा पा रहा है अभी ज़ेहन में था ये रौशन तख़य्युल फ़ज़ा में जो उड़ता चला जा रहा है लचक कर सँभलते हैं जब अब्र-पारे बरसते हैं दामन से दुम-दार तारे मचलती है रह रह के बालों में बिजली गुलाबी हुए जा रहे हैं किनारे फ़ज़ा झूम कर रंग बरसा रही है हर इक साँस शो'ला बनी जा रही है कभी इस तरह याद आती नहीं थी वो जिस तरह इस वक़्त याद आ रही है भला लुत्फ़ क्या मंज़र-ए-पुर-असर दे कि अश्कों ने आँखों पे डाले हैं पर्दे कहीं और जा कर बरस मस्त बादल ख़ुदा तेरा दामन जवाहिर से भर दे

Kaifi Azmi

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