"भारत माँ के वीर" हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम चट्टानों से डट के अड़े हैं माँ के वीर सरहद पे तैयार खड़े हैं माँ के वीर इस मिट्टी के कण कण में है तेरा नाम हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम सारी कली का बाग़ यहीं है दुनिया में देश हमारा सब सेे हसीं है दुनिया में देश ये अपना ईश्वर का है इक इनआ'म हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम मीठी मीठी बोली में है देश का हुस्न रंगो की रंगोली में है देश का हुस्न इस की छाया में ही मिलता है आराम हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम संदल की ख़ुशबू वतन का वातावरण गंगा जी से शुद्ध हुआ हर अंतःकरण चारो दिशाओं में है यहाँ पाकीज़ा मक़ाम हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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"तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है" ज़िंदा हूँ पर जान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है लम्हा लम्हा तन्हाई है बे-ताबी है रुसवाई है और जो ग़म की ये खाई है तेरी मोहब्बत में पाई है साँसों का एहसान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है हँसती है कब याद तुम्हारी डसती है अब याद तुम्हारी जलती है सब याद तुम्हारी मुझ में हर शब याद तुम्हारी मुश्किल है आसान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है बरखा सावन हार गई मैं जो था पावन हार गई मैं सब तन मन धन हार गई मैं या'नी जीवन हार गई मैं चैन का भी उनवान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है जाम में जब हम भर जाएँगे नाम तेरे वो कर जाएँगे थक के फिर हम घर जाएँगे इश्क़ में इक दिन मर जाएँगे तेरे सिवा ईमान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है
Ananya Rai Parashar
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"ये न पूछो कैसे जा कर मैं ने कोई गीत लिखा है" ये न पूछो कैसे जा कर मैं ने कोई गीत लिखा है दिल के तारो को छेड़ा है और दुखों का तोड़ लिखा है जीवन में जो कुछ होता है गुणा घटाना जोड़ लिखा है हँसी ठिठोली और आँसू है फिर दर्दों का सार लिखा है नाम तुम्हारा हर पन्ने पर जाने कितनी बार लिखा है हम ने अपनी हार लिखी है और तुम्हारी जीत लिखा है ये ना पूछो कैसे जा कर मैं ने कोई गीत लिखा है तुलसी की पाती पर मैं ने दिल के सब मनुहार लिखा है प्यार हमारा अमर रहे ये क्या क्या है स्वीकार लिखा है इन अधरों से उन अधरों का जो भी है संवाद लिखा है अपने दिल के इन भावों का एक सरल अनुवाद लिखा है ये रिश्ता है अपना कितना पावन और पुनीत लिखा है ये न पूछो कैसे जा कर मैं ने कोई गीत लिखा है
Ananya Rai Parashar
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"गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ" गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ तू जो है पास तो उजाला है वरना जीवन में बस अँधेरा है तेरे आने की जब ख़बर पाऊँ फूल से राह फिर सजाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ मेरे दिन रैन भी नहीं तुझ बिन एक ज़रा चैन भी नहीं तुझ बिन तू नज़र जब कहीं नहीं आता आँसू आँखों से बहाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ कितनी क़ातिल है दिल की तन्हाई जैसे धड़कन नहीं है, रूसवाई फिर कहीं लौट कर नहीं जाती तेरी आवाज़ पे जब आती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ क़ैद कर लो तुम अपनी बाहों में एक बस मैं रहूँ निगाहों में मुझ सेा जोगन नहीं तू पाएगा नाम का गीत तेरे गाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ सुब्ह हो जाऊँ रात हो जाऊँ इस तरह तेरे साथ हो जाऊँ तेरी तस्वीर बेक़रारी में अपने सीने से मैं लगाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ मुझ सेा पागल कहाँ मिलेगा तुम्हें रश्म सब इश्क़ के निभाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ
Ananya Rai Parashar
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