nazmKuch Alfaaz

"गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ" गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ तू जो है पास तो उजाला है वरना जीवन में बस अँधेरा है तेरे आने की जब ख़बर पाऊँ फूल से राह फिर सजाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ मेरे दिन रैन भी नहीं तुझ बिन एक ज़रा चैन भी नहीं तुझ बिन तू नज़र जब कहीं नहीं आता आँसू आँखों से बहाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ कितनी क़ातिल है दिल की तन्हाई जैसे धड़कन नहीं है, रूसवाई फिर कहीं लौट कर नहीं जाती तेरी आवाज़ पे जब आती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ क़ैद कर लो तुम अपनी बाहों में एक बस मैं रहूँ निगाहों में मुझ सेा जोगन नहीं तू पाएगा नाम का गीत तेरे गाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ सुब्ह हो जाऊँ रात हो जाऊँ इस तरह तेरे साथ हो जाऊँ तेरी तस्वीर बेक़रारी में अपने सीने से मैं लगाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ मुझ सेा पागल कहाँ मिलेगा तुम्हें रश्म सब इश्क़ के निभाती हूँ गुनगुनाती हूँ मुस्कुराती हूँ जब तेरी याद में समाती हूँ

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"भारत माँ के वीर" हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम चट्टानों से डट के अड़े हैं माँ के वीर सरहद पे तैयार खड़े हैं माँ के वीर इस मिट्टी के कण कण में है तेरा नाम हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम सारी कली का बाग़ यहीं है दुनिया में देश हमारा सब सेे हसीं है दुनिया में देश ये अपना ईश्वर का है इक इनआ'म हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम मीठी मीठी बोली में है देश का हुस्न रंगो की रंगोली में है देश का हुस्न इस की छाया में ही मिलता है आराम हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम संदल की ख़ुशबू वतन का वातावरण गंगा जी से शुद्ध हुआ हर अंतःकरण चारो दिशाओं में है यहाँ पाकीज़ा मक़ाम हम दिल से करते हैं बस एक ही काम भारत माँ के वीर जवानों तुम को सलाम

Ananya Rai Parashar

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"तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है" ज़िंदा हूँ पर जान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है लम्हा लम्हा तन्हाई है बे-ताबी है रुसवाई है और जो ग़म की ये खाई है तेरी मोहब्बत में पाई है साँसों का एहसान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है हँसती है कब याद तुम्हारी डसती है अब याद तुम्हारी जलती है सब याद तुम्हारी मुझ में हर शब याद तुम्हारी मुश्किल है आसान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है बरखा सावन हार गई मैं जो था पावन हार गई मैं सब तन मन धन हार गई मैं या'नी जीवन हार गई मैं चैन का भी उनवान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है जाम में जब हम भर जाएँगे नाम तेरे वो कर जाएँगे थक के फिर हम घर जाएँगे इश्क़ में इक दिन मर जाएँगे तेरे सिवा ईमान नहीं है तुझ बिन कुछ अरमान नहीं है

Ananya Rai Parashar

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"ये न पूछो कैसे जा कर मैं ने कोई गीत लिखा है" ये न पूछो कैसे जा कर मैं ने कोई गीत लिखा है दिल के तारो को छेड़ा है और दुखों का तोड़ लिखा है जीवन में जो कुछ होता है गुणा घटाना जोड़ लिखा है हँसी ठिठोली और आँसू है फिर दर्दों का सार लिखा है नाम तुम्हारा हर पन्ने पर जाने कितनी बार लिखा है हम ने अपनी हार लिखी है और तुम्हारी जीत लिखा है ये ना पूछो कैसे जा कर मैं ने कोई गीत लिखा है तुलसी की पाती पर मैं ने दिल के सब मनुहार लिखा है प्यार हमारा अमर रहे ये क्या क्या है स्वीकार लिखा है इन अधरों से उन अधरों का जो भी है संवाद लिखा है अपने दिल के इन भावों का एक सरल अनुवाद लिखा है ये रिश्ता है अपना कितना पावन और पुनीत लिखा है ये न पूछो कैसे जा कर मैं ने कोई गीत लिखा है

Ananya Rai Parashar

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