nazmKuch Alfaaz

जो भी मुश्किल राह में आई पल में थी आसान अपनी हिम्मत से इंसाँ ने मारा वो मैदान मिट्टी बोली मेरे दिल का निकला आज अरमान चाँद पे जा पहुँचा इंसान रॉकेट एक उड़ा धरती से और हवा में पहुँचा उस को हवा से क्या लेना था दूर फ़ज़ा में पहुँचा उस से भी कुछ आगे निकला और ख़ला में पहुँचा हिम्मत मैं तुझ पर क़ुर्बान चाँद पे जा पहुँचा इंसान जो भी मुश्किल राह में आई पल में थी आसान अब मिर्रीख़ भी दूर नहीं है चाँद पे जाने वाले तेरी हिम्मत पर नाज़ाँ हैं आज ज़माने वाले दूर ज़मीं से सय्यारों का खोज लगाने वाले इल्म-ओ-हुनर की एक नई तारीख़ बनाने वाले तेरा काम है आली-शान हिम्मत मैं तुझ पर क़ुर्बान चाँद पे जा पहुँचा इंसान जो भी मुश्किल राह में आई पल में थी आसान

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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कितनी रौशन क्यूँँ न हो 'आज़ाद' आख़िर एक दिन शम-ए-हस्ती मौत के झोंकों से गुल हो जाएगी जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार ज़ीस्त आग़ोश-ए-अजल में इस तरह सो जाएगी माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी लेकिन इस ज़ुल्मत-कदे में एक नूर ऐसा भी है गर्दिश-ए-अय्याम जिस के पास आ सकती नहीं एक ऐसा भी है लौह-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-दवाम कोई शय भी जिस को आलम से मिटा सकती नहीं मौत झोंके ले के उट्ठे या बगूले ले के आए अज़्मत-ए-किरदार का शो'ला बुझा सकती नहीं

Jagan Nath Azad

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ज़र्रे ज़र्रे पे बिजली सी बरसा गईं चलते चलते जो पंखा ज़रा रुक गया जिस को भी छू लिया उस को गरमा गईं झट पसीने का दरिया सा बहने लगा गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं ठंडी ठंडी हवाओं का मौसम गया गर्म पानी है कोई पिए किस तरह काली काली घटाओं का मौसम गया और न पानी पिए तो जिए किस तरह गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में पाँव मिट्टी पे जो पड़ गया लीजिए घर में बाहरस बर्फ़ आ गई धूप में क्या रखा आग पर रख दिया सारे बच्चों में पैदा हुई खलबली गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में घर से बाहर न जाए कोई बर्फ़ वाली कटोरी जो मुँह से लगी जान कर लू का झोंका न खाए कोई सच ये है जान में जान ही आ गई गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं मेज़ भी गर्म है खाट भी गर्म है फ़र्श भी गर्म है टाट भी गर्म है गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं

Jagan Nath Azad

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दामन-ए-लाला-ज़ार में आलम-ए-पुर-बहार देख कल्ला-ए-कोहसार पर जल्वा-ए-ज़र-निगार देख आब-ए-रवाँ की बात क्या ख़ाक पे है निखार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख देख नशात बाग़ में जल्वा-ए-सुब्ह का समाँ कैफ़ ओ नशात है ज़मीं नूर ओ सुरूर आसमाँ आह ये मंज़र-ए-जमील हाए ये जाँ-फ़ज़ा समाँ औज-ए-फ़लक से है रवाँ नूर का आबशार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख धार के कश्तियों का रूप ''डल'' पे रवाँ है ज़िंदगी चार तरफ़ फ़ज़ाओं में इत्र-फ़शाँ है ज़िंदगी बाद-ए-दज़ां है ज़िंदगी शोला-ब-जाँ है ज़िंदगी चर्ख़-ए-तख़य्युलात पर काहकशाँ है ज़िंदगी चेहरा-ब-चेहरा रू-ब-रू हुस्न का ये निखार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख ख़्वाह ''वुलर'' की झील है ख़्वाह फ़ज़ा-ए-पहल-गाम एक से बढ़ के एक है जो भी नज़र में है मक़ाम देख कि उन फ़ज़ाओं में फूल शराब के हैं जाम घास है फ़र्श-ए-मख़मलीं ज़र्रे हैं आसमाँ-मक़ाम और नहीं तुझे नसीब एक भी लम्हे का क़याम मौज-ए-नसीम-ए-सुब्ह से राज़ ये आश्कार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख

Jagan Nath Azad

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मैं इस ख़याल में था बुझ चुकी है आतिश-ए-दर्द भड़क रही थी मिरे दिल में जो ज़माने से मैं इस ख़याल में था हो चुकी है आग वो सर्द वो एक शोला-ए-दर्द-आफ़रीं मता-ए-हयात मैं इस ख़याल में था मैं उसे बचा न सका गुमाँ ये था कि वो इक शोला-ए-हयात-अफ़रोज़ हवा-ए-पैरिस-ओ-लंदन की ताब ला न सका मैं सोचता था कि शायद भुला चुका हूँ तुझे जो अपने दिल की कहानी तुझे सुनाना थी वो अपने साज़-ए-ग़ज़ल पर सुना चुका हूँ तुझे कुछ ऐसा मुझ को गुमाँ था तुफ़ैल-ए-मरहम-ए-वक़्त कोई भी घाव हो इक रोज़ भर ही जाता है ज़माना वक़्त के पर्दे पे हर घड़ी शायद नया तिलिस्म नई दिलकशी सजाता है जो हैं रफ़ीक़-ए-दिल-ओ-जान उन आँसुओं की क़सम तिरे हुज़ूर अभी तक जो बार पा न सके जिन्हें है तुझ से सिवा तिरी आबरू का ख़याल जो दिल में रुक न सके और मिज़ा तक आ न सका मिला हूँ आज मैं तुझ से तो वसवसे ये तमाम मिटे ख़याल की दुनिया से मिस्ल-ए-नक़्श-बर-आब पता चला कि वो शो'ला बुझा नहीं है अभी बस इतनी बात है अब जल रहा है ज़ेर-ए-नक़ाब नक़ाब-ए-वक़्त-ओ-मसाफ़त के दो दबीज़ हिजाब गुज़र गई तिरी फ़ुर्क़त में ज़िंदगी जितनी अदन की सुब्ह कि पैरिस की रात में गुज़री दिल ओ नज़र के किसी वारदात में गुज़री कि इक हसीना-ए-आलम से बात में गुज़री फ़क़त वो एक नदामत है और कुछ भी नहीं और आज मेरी नदामत का ये शदीद एहसास हर एक साँस में मुझ से सवाल करता है हवस है इश्क़ से कितने क़दम? दो-चार क़दम? किया है फ़ासला उन में कई हज़ार क़दम? पिकैडली में भी हम याद थे तुझे कि न थे पिगाल में भी ख़लिश कोई दिल में थी की न थी वो शाम टेम्स की अब भी नज़र में है कि नहीं कि जब हवस की नज़र पर कोई हिजाब न था वो सतह-ए-बहर पे रक़्साँ जहाज़ का अर्शा और उस पे चार तरफ़ एक नूर का आलम कि जैसे बर्क़-ए-तजल्ली-ए-तूर का आलम वेलेंशिया में वो रक़्स-ए-बरहनगी के तिलिस्म तिरी निगाह-ए-तमाशा को कुछ झिजक तो न थी ये इक सवाल कि जिस के हज़ार पहलू हैं मैं एक लम्हे को जब इन पे ग़ौर करता हूँ तो सोचता हूँ की मैं तुझ से अब मलूँ न मलूँ

Jagan Nath Azad

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इस तरह आज फिर आबाद है वीराना-ए-दिल कि है लबरेज़ मय-ए-शौक़ से पैमाना-ए-दिल दिल-ए-बेताब में पिन्हाँ है हर अरमान-ए-नज़र चश्म-ए-मुश्ताक़ में है सुर्ख़ी-ए-अफ़्साना-ए-दिल आज शम्ओं से ये कह दो कि ख़बर-दार रहें आज बेदार है ख़ाकिस्तर-ए-परवाना-ए-दिल इस को है एक फ़क़त देखने वाला दरकार तूर से कम तो नहीं जल्वा-ए-जानाना-ए-दिल जाग भी ख़्वाब से ऐ मशरिक़ ओ मग़रिब के हकीम कि तिरे वास्ते लाया हूँ मैं नज़राना-ए-दिल ये ज़रा देख कि आए हैं कहाँ से दोनों दिल तिरी ख़ाक का दीवाना मैं दीवाना-ए-दिल शौक़ की राह में इक सख़्त मक़ाम आया है मिरा टूटा हुआ दिल ही मिरे काम आया है साक़ी-ए-जाँ तिरे मय-ख़ाने का इक रिंद-ए-हक़ीर मिस्ल-ए-बू तोड़ के हर क़ैद-ए-मक़ाम आया है अल्लाह अल्लाह तिरी बज़्म का ये आलम-ए-कैफ़ मेरे हाथों में छलकता हुआ जाम आया है तिरे नाम आज ज़माने के महकते हुए फूल 'ग़ालिब' ओ 'मीर' के गुलशन का सलाम आया है वो मिरी हसरत-ए-देरीना का शहबाज़-ए-जलील कितनी मुद्दत में बिल-आख़िर तह-ए-दाम आया है तुझ को भी दिल में बसाया है जो 'इक़बाल' के साथ तो कहीं जा के ये अंदाज़-ए-कलाम आया है क्यूँँ तुझे ये अबदी नींद पसंद आई है ऐ कि हर लफ़्ज़ तिरा शान-ए-मसीहाई है साक़ी-ए-मय-कदा-ए-ज़ीस्त ज़रा आँख तो खोल तिरी तुर्बत पे सियह मस्त घटा छाई है जाग भी ख़्वाब से दिल-दादा-ए-गुलज़ार-ओ-चमन कि तिरे देस की बाग़ों पे बहार आई है जो तिरे घर में है आज उस चमनिस्ताँ को तो देख ज़र्रे ज़र्रे को जुनून-ए-चमन-आराई है 'हाथवे' का है मकाँ वो कि ''मक़ाम-ए-नौ'' है जो भी ख़ित्ता है वो इक पैकर-ए-ज़ेबाई है कुछ ख़बर भी है कि ऐवाँ की हसीं मौजों में जो तिरे दौर में थी अब भी वो रा'नाई है वो तिरा नग़्मा कि सीनों में तपाँ आज भी है अहल-ए-एहसास का सरमाया-ए-जाँ आज भी है रिंद हैं मशरिक़ ओ मग़रिब में उसी के मुश्ताक़ वो तिरा बादा-ए-कोहना कि जवाँ आज भी है आज भी काबा-ए-अरबाब-ए-नज़र है तिरी फ़िक्र विर्सा-ए-अहल-ए-जुनूँ तेरा बयाँ आज भी है आज से चार सदी क़ब्ल जो चमका था कभी तिरे नग़्मात में वो सोज़-ए-निहाँ आज भी है जिस में है बादा जुनूँ का भी मय-ए-होश के साथ तिरे हाथों में वही रत्ल-ए-गिराँ आज भी है तू ने तमसील के जादे पे दिखाया जो कभी वही मील और वही संग-ए-निशाँ आज भी है ज़ुल्मत-ए-दहर की रातों में सहर-बार है तू ज़ीस्त इक क़ाफ़िला है क़ाफ़िला-सालार है तू तू हर इक दौर में है दीदा-ए-बीना की तरह हर ज़माने में दिल-ए-ज़िंदा-ओ-बेदार है तू जिस की बातों में धड़कता है दिल-ए-अस्र-ए-रवाँ आज तमसील-ए-ज़माना का वो किरदार है तू क्यूँँ न हो लौह ओ क़लम को तिरे उस्लूब पे नाज़ हसन-ए-गुफ़्तार है गंजीना-ए-अफ़्कार है तू बज़्म-ए-जानाँ हो तो अंदाज़ तिरा फूल की शाख़ ज़ुल्म के सामने शमशीर-ए-जिगर-दार है तो तू किसी मुल्क किसी दौर का फ़नकार नहीं बल्कि हर मुल्क का हर दौर का फ़नकार है तू

Jagan Nath Azad

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