घटा छाई है सावन की झड़ी है दिल-ए-मग़्मूम की खेती हरी है छलक उट्ठा है पैमाना नज़र का बुख़ार-ए-दिल की आशुफ़्ता-सरी है रुख़-ए-महताब पर तारों के हाले ये तारे हैं कि मोती की लड़ी है उजाले के लिए शम-ए-फ़रोज़ाँ अंधेरे में सर-ए-मिज़्गाँ धरी है गुल-ए-नर्गिस पे हैं शबनम के क़तरे कि सीपी है जो मोती से भरी है उमँड आया है दरिया जज़्ब-ए-दिल का भँवर में सब्र की कश्ती पड़ी है 'जमील' अश'आर में गौहर-फ़िशानी ये चश्म-ए-तर की सब जादू-गरी है
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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'फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है' फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है ख़्वाब सारे टूट कर कहीं सिफ़र जाने को हैं घोंसला वहम-ओ-गुमान का फिर से उजड़ जाने को है ज़ख़्म वो पुराने फिर निखर आने को हैं सारा जहाँ मानो गहरी नींद में सो गया है ये मन मेरा फिर उन हसीं यादों में खो गया है क़लम जैसे फिर कोई नज़्म लिखने की ज़िद पे अड़ी है शरीफ़ दिल की ये आदत आज भी बहुत बुरी है आँखों से नींद फिर गुम सी गई है सीने में धड़कन जैसे थम सी गई है ये चंचल हवाऍं ये गुम सुम घटाऍं मुझे ख़ुद से कहीं दूर ले जा रही हैं वो सुनसान सड़कें वो वीरान गलियाँ मुझे फिर से अपने पास बुला रही हैं हरेक परवाने को जैसे बस शमा' की तलाश है लहरों के मन में भी कोई अधूरी सी प्यास है सितारे अब चमक चमक कर थक से गए हैं पत्ते भी पूरी तरह शबनम से लिपट गए हैं वक़्त जैसे रेत की तरह फिसल रहा है चाँद तेजी से फ़लक की ओर बढ़ रहा है ये सुकून-ए-अँधेरा फिर से उतर जाने को है ये ख़ूब-सूरत नज़ारे फिर से बिखर जाने को हैं फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है
Rehaan
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सावन आया उन के घर, मेरे भी घर उन के आंगन में मँडरायीं खूब घटायें काली काली, उन के ऑँगन के गमलों में विखर गई सुंदर हरियाली, नूतन किसलय फूट पडे हैं झूम रही है डाली डाली, कुछ भी हो उन के आँगन की सुन्दरता है बहुत निराली। उन के घर कोने कोने में उमडा है ख़ुशियों का सागर..। सावन आया............ मेरे घर की बूढी छत ने अपनी जर्जरता दिखलाई, कमरे में पानी भर आया आँगन में पसरी है काई, छोटू बिट्टू मुन्नू मिट्ठू ने अपनी कश्ती तैराई, वो भी ख़ुश हैं मैं भी ख़ुश हूँ सावन तुझ को लाख बधाई। उन का सावन भी सुंदर है मेरा सावन उन सेे सुन्दर। सावन आया उन के घर, मेरे भी घर
Gyan Prakash Akul
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तुम इक दिन भूल जाओगे हँसाओगे रुलाओगे तुम इक दिन भूल जाओगे हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे दिखाओगे मुझे सपने ख़ुशी की वादियों वाले जज़ीरों में कहीं तन्हा मुझे तुम छोड़ आओगे हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे तुम्हें ना देख कर कितनी तड़पती हैं मेरी आँखें तुम्हें खो देने के डर से ये जागी हैं कई रातें उदासी छाई रहती है दिल-ए-बे-ताब में जितनी मुझे लगता नहीं है ये कि तुम भी छटपटाओगे हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे मुहब्बत कितनी है दिल में यक़ीनन कह न पाऊँगा मगर इतना यक़ीं तो है कि तुम बिन रह न पाऊँगा बड़े वादे किए तुम ने रहूँगा साथ मैं हमदम हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे हँसाओगे रुलाओगे तुम इक दिन भूल जाओगे हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे
Ambar
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पल दो पल जी लेते हैं यादों के गहरे दरिया में हम हर दिन डुबकी लेते हैं ख़्वाबों में तुम मिल जाते हो फिर पल दो पल जी लेते हैं इश्क़ अधूरा अपना है जो मुमकिन है पूरा कब होना हम दोनों ने ख़्वाब बुने जो फ़ितरत है उन की बस रोना दर्द दवा अपनी है केवल उस को ही अब पी लेते हैं सावन आया प्यारा सब को हम दोनों के तन मन बहके सबकी आज मिलन की बेला बूँद हमें शोलों सी दहके अंबर भी रोते रह-रह कर जब जब हम सिसकी लेते हैं बेगानों में कौन सुनेगा किस को जा कर दर्द सुनाएँ ज़हर ज़ुदाई का पीना है गीत विरह के आओ गाएँ बाग़ों में चातक के सुर पर रागों की मुरकी लेते हैं
Nityanand Vajpayee
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स्याही कुदूरत की दिल से निकालो नज़र को मोहब्बत के साँचे में ढालो वतन के तअ'य्युन से बाला है मोमिन ज़माने का नज़्म-ए-गुलिस्ताँ सँभालो निगार-ए-चमन के तशख़्ख़ुस की ख़ातिर उख़ुव्वत सदाक़त को शेवा बना लो मोहब्बत का भूका है सारा ज़माना ज़माने को बढ़ कर गले से लगा लो किसी का सहारा सर-ए-राह बन कर अगर हो सके तो ये नेकी कमा लो नज़र आए कोई अगर दुख पराया न कतराओ उस दुख को अपना बना लो है ज़ुल्मत-कदा गोशा-ए-दिल भी जिस का चराग़-ए-मोहब्बत से उस को उजालो
Jameel Azimabadi
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वो वा'दा आप का वा'दा न अब तक हो सका पूरा ज़मीं बदली ज़माँ बदला मगर वो वा'दा-ए-फ़र्दा अभी तक इक मुअ'म्मा है अगरचे ये हक़ीक़त है कि रंग-ए-ख़ुसरवी बदला जहान-ए-ख़ुद-फ़रामोशी के बादल छट गए सारे शफ़क़ फूटी किरन फूटी धनक उभरी मगर सूरज जो निकला सुब्ह-दम तो ख़ुद अपनी तीरा-बख़्ती पर पशेमाँ और मगर वो वा'दा-ए-फ़र्दा अभी तक इक मुअ'म्मा है ख़बर हो आप को शायद कि ज़ुल्मत के शिकंजे में सदाक़त सुब्ह की दहलीज़ पर घुट घुट के मरती है सहर ख़्वाब-ए-परेशाँ है वो वा'दा आप का वा'दा न जाने कब हदीस-ए-दिल बनेगा और मीज़ान-ए-सदाक़त में तुलेगा रू-ब-रू सब के
Jameel Azimabadi
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झुकी झुकी सी नज़रें क्यूँ हैं उड़ी उड़ी सी रंगत क्यूँ है चुप चुप क्यूँ हैं ख़ौफ़ के मारे गुम-सुम का क्यूँ रूप हैं धारे ये घर तो हम सब का घर है खुला हुआ जिस घर का दर है शाहों का दरबार नहीं है पीरों की दरगाह नहीं है माँगे हम बे-रोक जो चाहें सब पर ये दरबार खुला है गोरे काले एक हैं सारे राजा प्रजा हाथ पसारे हम भी कह दें जो कहना है डरते क्यूँ हैं ये वो दर है जिस के आगे एक हैं सारे झूटे हैं सब और सहारे
Jameel Azimabadi
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