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बुलंद बाँग दा'वों की आवाज़ें खोटे सिक्कों की तरह बजती हैं फिर भी छोटे क़द के लोग इन क़द-आवर आवाज़ों को सुनते रहते हैं काग़ज़ के टुकड़ों की अब कोई क़ीमत न रही फिर भी भूकी आँखें उन्हें ढूँढती हैं और नाकाम रहती हैं और बे-रहम हाथ उन्हें जम्अ'' करते रहते हैं छोटे क़द के लोग अपनी आवाज़ खो चुके हैं वो सिर्फ़ देख सकते हैं और सुन सकते हैं

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"पंद्रह अगस्त" ख़ुशियों के गीत गाओ कि पंद्रह अगस्त है सब मिल के मुस्कुराओ कि पंद्रह अगस्त है हर सम्त क़हक़हे हैं चराग़ाँ है हर तरफ़ तुम ख़ुद भी जगमगाओ कि पंद्रह अगस्त है हर गोशा-ए-वतन को निखारो सँवार दो महकाओ लहलहाओ कि पंद्रह अगस्त है आज़ादी-ए-वतन पे हुए हैं कई निसार ख़ातिर में इन को लाओ कि पंद्रह अगस्त है रक्खो न सिर्फ़ ख़ंदा-ए-गुल हैं निगाह में काँटों को भी हँसाओ कि पंद्रह अगस्त है रूहें अमान-ओ-अम्न की प्यासी हैं आज भी प्यास इन की अब बुझाओ कि पंद्रह अगस्त है शम्अ''' ख़ुलूस-ओ-उन्स की मद्धम है रौशनी लौ और कुछ बढ़ाओ कि पंद्रह अगस्त है ये अहद तुम करो कि फ़सादात फिर न हों हाँ आग ये बुझाओ कि पंद्रह अगस्त है खाओ क़सम कि ख़ून पिलाएँगे मुल्क को दिल से क़सम ये खाओ कि पंद्रह अगस्त है हर हादसे में अहल-ए-वतन मुस्तइद रहें वो वलवला जगाओ कि पंद्रह अगस्त है ऊँचा रहे शराफ़त-ओ-अख़्लाक़ का अलम परचम बुलंद उठाओ कि पंद्रह अगस्त है हो दर्द-ए-दिल में जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन फ़ुज़ूँ 'मफ़्तूँ' क़लम उठाओ कि पंद्रह अगस्त है

Maftun Kotvi

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ये साँप आज जो फन उठाए मिरे रास्ते में खड़ा है पड़ा था क़दम चाँद पर मेरा जिस दिन उसी दिन इसे मार डाला था मैं ने उखाड़े थे सब दाँत कुचला था सर भी मरोड़ी थी दुम तोड़ दी थी कमर भी मगर चाँद से झुक के देखा जो मैं ने तो दुम इस की हिलने लगी थी ये कुछ रेंगने भी लगा था ये कुछ रेंगता कुछ घिसटता हुआ पुराने शिवाले की जानिब चला जहाँ दूध इस को पिलाया गया पढ़े पंडितों ने कई मंतर ऐसे ये कम-बख़्त फिर से जिलाया गया शिवाले से निकला वो फुंकारता रग-ए-अर्ज़ पर डंक सा मारता बढ़ा मैं कि इक बार फिर सर कुचल दूँ इसे भारी क़दमों से अपने मसल दूँ क़रीब एक वीरान मस्जिद थी, मस्जिद में ये जा छुपा जहाँ इस को पेट्रोल से ग़ुस्ल दे कर हसीन एक तावीज़ गर्दन में डाला गया हुआ जितना सदियों में इंसाँ बुलंद ये कुछ उस से ऊँचा उछाला गया उछल के ये गिरजा की दहलीज़ पर जा गिरा जहाँ इस को सोने की केचुल पहनाई गई सलीब एक चाँदी की सीने पे उस के सजाई गई दिया जिस ने दुनिया को पैग़ाम-ए-अम्न उसी के हयात-आफ़रीं नाम पर उसे जंग-बाज़ी सिखाई गई बमों का गुलू-बंद गर्दन में डाला और इस धज से मैदाँ में उस को निकाला पड़ा उस का धरती पे साया तो धरती की रफ़्तार रुकने लगी अँधेरा अँधेरा ज़मीं से फ़लक तक अँधेरा जबीं चाँद तारों की झुकने लगी हुई जब से साइंस ज़र की मुतीअ जो था अलम का ए'तिबार उठ गया और इस साँप को ज़िंदगी मिल गई इसे हम ने ज़ह्हाक के भारी काँधे पे देखा था इक दिन ये हिन्दू नहीं है मुसलमाँ नहीं ये दोनों का मग़्ज़ और ख़ूँ चाटता है बने जब ये हिन्दू मुसलमान इंसाँ उसी दिन ये कम-बख़्त मर जाएगा

Kaifi Azmi

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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है

Aasi Rizvi

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"वक़्त" ये वक़्त ही है जिस ने किसू को दुख में हँसा दिया किसू को ख़ुशी में रुला दिया किसू को दिन में सुला दिया किसू को शब में उठा दिया ये वक़्त ही है जो कभू घर को उजाड़ दे कभू घर को सँवार दे कभू दे सब्ज़ जा-ब-जा कभू बहार छीन ले ये कौन है ये कौन है ये वक़्त है ये वक़्त है उसूल का सख़्त है जब इसने पासे पलट दिए फ़क़ीर सेठ हो गए चूहे शे'र हो गए इसी से लाठियाँ चलीं इसी से हस्तियाँ मिटीं इसी से बाज़ियाँ कटीं इसी से बस्तियाँ जलीं इसी से गोलियाँ चलीं वक़्त की जंग में किसू ने हाथ खो दिया किसू ने कुछ गँवा दिया ये वक़्त ही है जिस ने एक से एक धुरंधर को माटी में मिला दिया बुलंद जिस के हौसले क़दर जो वक़्त की जानता वक़्त उसी का हसीन है जिस का वक़्त हसीन है समझो वो नवाब है जो इस सेे अनजान है उस का वक़्त ख़राब है

Prashant Kumar

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"जम्हूरियत" ये वतन अब भी जलने को मजबूर है और हाकिम नशे में बहुत चूर है इक सियासत की रोटी पे ये पल रहे इनका काफ़ी पुराना ये दस्तूर है आग लगती है जब भी यहाँ से वहाँ ख़ुश तो होते हैं अक्सर ये बे-इंतिहा वो तो लोग और थे जो वतन पर मरे अब तो मिलते नहीं ऐसे भी हम-रहाँ ज़ुल्म वालों की सफ में खड़े दिख रहे चंद सिक्कों की ख़ातिर ही ये बिक रहे साफ़ दामन उन्हीं का अभी तक मिला जो ख़िलाफ़त में इनका ही सच लिख रहे बीच नफ़रत में सब को धकेला गया खेल हम सब से कुछ ऐसा खेला गया सब ने मारा है मिल कर उसी को यहाँ जो भी सड़कों पे अबतक अकेला गया

Ansar Ethvi

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मेरा साया मेरे क़द से बड़ा है लेकिन जब रौशनी का ज़ाविया बदलेगा साया छोटा हो जाएगा मेरा साया रौशनी का ग़ुलाम है

Ehtisham Akhtar

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रौशनी की कोई सरहद नहीं कोई मज़हब नहीं हवा का कोई जिस्म नहीं कोई मुल्क नहीं पानी का कोई रंग नहीं रौशनी को कोई नाम न दो हवा को कोई जिस्म न दो पानी को रंगीन न बनाओ पानी में लहू न मिलाओ

Ehtisham Akhtar

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ख़ाली गिलास के मुक़द्दर में होंटों का लम्स हाथों की नर्मी कहाँ शबनम रोती है उसे फ़ना का ग़म है लम्स की क़ीमत का एहसास नहीं है उस को फूलों की आग़ोश में मौत भी हसीन हो जाती है ज़िंदगी की तरह ख़ुश-क़िस्मत हैं वो लिफ़ाफ़े जिन पर सब्त होती है मोहर हुसैन लबों की मुझे भी कोई छोले मुझे भी कोई पी ले मैं फिर टूट-फूट जाऊँगा ख़ाली गिलास के मुक़द्दर में मगर होंटों का लम्स हाथों की नर्मी कहाँ

Ehtisham Akhtar

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ज़िंदगी बस की क़तार के इश्क़ की तरह सत्ही सही लेकिन बे-कैफ़ नहीं ज़िंदगी दिलकश है शहर के हंगामों की तरह मैं हंगामों का दिल-दादा हूँ ख़मोशी से नफ़रत है मुझे कि मैं ख़ामोशी में बीते कल की टिक-टिक घड़ी की तरह सुन नहीं सकता

Ehtisham Akhtar

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कल भी बारिश हुई थी आज भी बारिश होगी और फिर खोखली अज़्मतें पैदल चलती सड़कों पर कीचड़ उछालते हुए हवा की तरह गुज़र जाएँगी आरास्ता दूकानें ये तमाशा देखेंगी और हँसेंगी

Ehtisham Akhtar

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