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ये साँप आज जो फन उठाए मिरे रास्ते में खड़ा है पड़ा था क़दम चाँद पर मेरा जिस दिन उसी दिन इसे मार डाला था मैं ने उखाड़े थे सब दाँत कुचला था सर भी मरोड़ी थी दुम तोड़ दी थी कमर भी मगर चाँद से झुक के देखा जो मैं ने तो दुम इस की हिलने लगी थी ये कुछ रेंगने भी लगा था ये कुछ रेंगता कुछ घिसटता हुआ पुराने शिवाले की जानिब चला जहाँ दूध इस को पिलाया गया पढ़े पंडितों ने कई मंतर ऐसे ये कम-बख़्त फिर से जिलाया गया शिवाले से निकला वो फुंकारता रग-ए-अर्ज़ पर डंक सा मारता बढ़ा मैं कि इक बार फिर सर कुचल दूँ इसे भारी क़दमों से अपने मसल दूँ क़रीब एक वीरान मस्जिद थी, मस्जिद में ये जा छुपा जहाँ इस को पेट्रोल से ग़ुस्ल दे कर हसीन एक तावीज़ गर्दन में डाला गया हुआ जितना सदियों में इंसाँ बुलंद ये कुछ उस से ऊँचा उछाला गया उछल के ये गिरजा की दहलीज़ पर जा गिरा जहाँ इस को सोने की केचुल पहनाई गई सलीब एक चाँदी की सीने पे उस के सजाई गई दिया जिस ने दुनिया को पैग़ाम-ए-अम्न उसी के हयात-आफ़रीं नाम पर उसे जंग-बाज़ी सिखाई गई बमों का गुलू-बंद गर्दन में डाला और इस धज से मैदाँ में उस को निकाला पड़ा उस का धरती पे साया तो धरती की रफ़्तार रुकने लगी अँधेरा अँधेरा ज़मीं से फ़लक तक अँधेरा जबीं चाँद तारों की झुकने लगी हुई जब से साइंस ज़र की मुतीअ जो था अलम का ए'तिबार उठ गया और इस साँप को ज़िंदगी मिल गई इसे हम ने ज़ह्हाक के भारी काँधे पे देखा था इक दिन ये हिन्दू नहीं है मुसलमाँ नहीं ये दोनों का मग़्ज़ और ख़ूँ चाटता है बने जब ये हिन्दू मुसलमान इंसाँ उसी दिन ये कम-बख़्त मर जाएगा

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठना मिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना ये गुफ़्तुगू गुफ़्तुगू नहीं है बिगड़ने बनने का मरहला है धड़क रहा है फ़ज़ा का सीना कि ज़िंदगी का मुआमला है ख़िज़ाँ रहे या बहार आए तुम्हारे हाथों में फ़ैसला है न चैन बे-ताब बिजलियों को न मुतमइन कारवान-ए-शबनम कभी शगूफ़ों के गर्म तेवर कभी गुलों का मिज़ाज बरहम शगूफ़ा ओ गुल के इस तसादुम में गुल्सिताँ बन गया जहन्नम सजा लें सब अपनी अपनी जन्नत अब ऐसे ख़ाके बना के उठना ख़ज़ाना-ए-रंग-ओ-नूर तारीक रहगुज़ारों में लुट रहा है उरूस-ए-गुल का ग़ुरूर-ए-इस्मत सियाहकारों में लुट रहा है तमाम सरमाया-ए-लताफ़त ज़लील ख़ारों में लुट रहा है घुटी घुटी हैं नुमू की साँसें छुटी छुटी नब्ज़-ए-गुलिस्ताँ है हैं गुरसना फूल, तिश्ना ग़ुंचे, रुख़ों पे ज़र्दी लबों पे जाँ है असीर हैं हम-सफ़ीर जब से ख़िज़ाँ चमन में रवाँ-दवाँ है इस इंतिशार-ए-चमन की सौगंद बाब-ए-ज़िंदाँ हिला के उठना हयात-ए-गीती की आज बदली हुई निगाहें हैं इंक़िलाबी उफ़ुक़ से किरनें उतर रही हैं बिखेरती नूर-ए-कामयाबी नई सहर चाहती है ख़्वाबों की बज़्म में इज़्न-ए-बारयाबी ये तीरगी का हुजूम कब तक ये यास का अज़दहाम कब तक निफ़ाक़ ओ ग़फ़लत की आड़ ले कर जियेगा मुर्दा निज़ाम कब तक रहेंगे हिन्दी असीर कब तक रहेगा भारत ग़ुलाम कब तक गले का तौक़ आ रहे क़दम पर कुछ इस तरह तिलमिला के उठना

Kaifi Azmi

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ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुई पत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुई मौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश है शाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश है चंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुए जैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुए खप गया है यूँँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंग जिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंग उमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिए या चली है बाल खोले राँड रोने के लिए जितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान है हर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान है इक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहीं चिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहीं सो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँ हो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँ हाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागर ले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम कर दिल सँभलता ही नहीं है सीना-ए-सद-चाक में फूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक में उड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआर हो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशार हसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश में सैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश में उम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिए बार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिए चाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहीं हाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहीं थरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़र ले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सर जब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँ आह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँ हो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराम मुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवाम दोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गया प्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गया ले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरार आग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रार पड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभी उँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभी आ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईं और कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईं इतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहीं यास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहीं आ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूक फट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूक अपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद है ऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद है बाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहार ख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकार जब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथ ज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथ दिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़ चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़ दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगी ये नहीं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगी वाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोई चाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोई वाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैं रहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैं दिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गया हाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गया तिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफती पी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपती मौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गए साँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गए आँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गई मौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गई और कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दाम ऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम

Kaifi Azmi

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ऐ हमा-रंग हमा-नूर हमा-सोज़-ओ-गुदाज़ बज़्म-ए-महताब से आने की ज़रूरत क्या थी तू जहाँ थी उसी जन्नत में निखरता तिरा रूप इस जहन्नम को बसाने की ज़रूरत क्या थी ये ख़द-ओ-ख़ाल ये ख़्वाबों से तराशा हुआ जिस्म और दिल जिस पे ख़द-ओ-ख़ाल की नर्मी भी निसार ख़ार ही ख़ार शरारे ही शरारे हैं यहाँ और थम थम के उठा पाँव बहारों की बहार तिश्नगी ज़हर भी पी जाती है अमृत की तरह जाने किस जाम पे रुक जाए निगाह-ए-मासूम डूबते देखा है जिन आँखों में मय-ख़ाना भी प्यास उन आँखों की बुझे या न बुझे क्या मालूम हैं सभी हुस्न-परस्त अहल-ए-नज़र साहिब-ए-दिल कोई घर में कोई महफ़िल में सजाएगा तुझे तू फ़क़त जिस्म नहीं शे'र भी है गीत भी है कौन अश्कों की घनी छाँव में गाएगा तुझे तुझ से इक दर्द का रिश्ता भी है बस प्यार नहीं अपने आँचल पे मुझे अश्क बहा लेने दे तू जहाँ जाती है जा, रोकने वाला मैं कौन अपने रस्ते में मगर शम्अ' जला लेने दे

Kaifi Azmi

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मुद्दतों मैं इक अंधे कुएँ में असीर सर पटकता रहा गिड़गिड़ाता रहा रौशनी चाहिए، चाँदनी चाहिए، ज़िंदगी चाहिए रौशनी प्यार की, चाँदनी यार की, ज़िंदगी दार की अपनी आवाज़ सुनता रहा रात दिन धीरे धीरे यक़ीं दिल को आता रहा सूने संसार में बे-वफ़ा यार में दामन-ए-दार में रौशनी भी नहीं चाँदनी भी नहीं ज़िंदगी भी नहीं ज़िंदगी एक रात वाहिमा काएनात आदमी बे-बिसात लोग कोताह-क़द शहर शहर-ए-हसद गाँव इन से भी बद इन अँधेरों ने जब पीस डाला मुझे फिर अचानक कुएँ ने उछाला मुझे अपने सीने से बाहर निकाला मुझे सैकड़ों मिस्र थे सामने सैकड़ों उस के बाज़ार थे एक बूढ़ी ज़ुलेख़ा नहीं जाने कितने ख़रीदार थे बढ़ता जाता था यूसुफ़ का मोल लोग बिकने को तय्यार थे खुल गए मह-जबीनों के सर रेशमी चादरें हट गईं पलकें झपकीं न नज़रें झुकीं मरमरीं उँगलियाँ कट गईं हाथ दामन तक आया कोई धज्जियाँ दूर तक बट गईं मैं ने डर के लगा दी कुएँ में छलांग सर पटकने लगा फिर इसी कर्ब से फिर इसी दर्द से गिड़गिड़ाने लगा रौशनी चाहिए चाँदनी चाहिए ज़िंदगी चाहिए

Kaifi Azmi

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ये सेहहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानी उफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसे छलकती रौशनी तारीकियों पे छाई जाती है उड़ाए नाज़ियत की लाश पर कोई कफ़न जैसे उबलती सुर्ख़ियों की ज़द पे हैं हल्क़े सियाही के पड़ी हो आग में बिखरी ग़ुलामी की रसन जैसे शफ़क़ की चादरें रंगीं फ़ज़ा में थरथराती हैं उड़ाए लाल झंडा इश्तिराकी अंजुमन जैसे चली आती है शरमाई लजाई हूर-ए-बेदारी भरे घर में क़दम थम थम के रखती है दुल्हन जैसे फ़ज़ा गूँजी हुई है सुब्ह के ताज़ा तरानों से सुरूद-ए-फ़त्ह पर हैं सुर्ख़ फ़ौजें नग़्मा-ज़न जैसे हवा की नर्म लहरें गुदगुदाती हैं उमंगों को जवाँ जज़्बात से करता हो चुहलें बाँकपन जैसे ये सादा सादा गर्दूं पे तबस्सुम-आफ़रीं सूरज पै-दर-पै कामयाबी से हो स्तालिन मगन जैसे सहर के आइने में देखता हूँ हुस्न-ए-मुस्तक़बिल उतर आई है चश्म-ए-शौक़ में 'कैफ़ी' किरन जैसे

Kaifi Azmi

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