इक लड़के की रंगीं दस्ती एक लड़के ने आ के चुराई इधर उधर वो ढूँड रहा था किसी ने चुपके से ये बताया फुलाँ ने तेरी दस्ती चुराई गया वो फ़ौरन देखा पाई उस ने उस को ख़ूब ही मारा चोर सभों ने कह के पुकारा सुना जो उस के बाप और माँ ने मारा और हुए नाराज़ उस से इक चोरी करने से बच्चो कितनी दुर्गत होती है देखो कभी न भूल के चोरी करना होगे वर्ना तुम भी रुस्वा छोटे बड़ों को होगी नफ़रत कुछ न रहेगी तुम्हारी इज़्ज़त कभी न भूल के चोरी करना कान मिरे कहने पर धरना 'जौहर' है इक तुम्हारा भाई चाहता है ये सब की भलाई
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"तेरी शिकायत" तेरी शिकायत रही मुझ सेे तेरे लिए कुछ लिख न सका मैं तेरी शिकायत रही मुझ सेे अब यही लिख रहा हूँ मैं तू ने उम्मीद न रखी मुझ सेे तेरे लिए कुछ कर न सका मैं तेरी उम्मीद रही मुझ सेे अब तुझे ढूंढता हूँ मैं कि तू ने सारे वादे निभाए मुझ सेे और तेरा हो न सका मैं तू ने माँगा ही क्या था मुझ सेे अब यही सोचता हूँ मैं यूँँ तुझे देखा न गया मुझ सेे तेरे आँसू पोंछ न सका मैं एक तू उधर नाराज़ रहा मुझ सेे इधर ख़ुद को कोसता हूँ मैं
Mohneesh Kumar
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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....
Ankit Maurya
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अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने हम ने सोच रखा है रात यूँँ गुज़ारेंगे धड़कनें बिछा देंगे शोख़ तेरे क़दमों पे हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे ज़िन्दगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है उँगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म सँवारिए साहब ज़िन्दगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या सँवारेंगे हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियाँ हैं बे-क़रार लमहे हैं, बेथकान सदियाँ हैं कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे
Zafar Gorakhpuri
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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
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कहो हिन्दोस्ताँ की जय कहो हिन्दोस्ताँ की जय क़सम है ख़ून से सींचे हुए रंगीं गुलिस्ताँ की क़सम है ख़ून-ए-दहक़ाँ की क़सम ख़ून-ए-शहीदाँ की ये मुमकिन है कि दुनिया के समुंदर ख़ुश्क हो जाएँ ये मुमकिन है कि दरिया बहते बहते थक के सो जाएँ जलाना छोड़ दें दोज़ख़ के अंगारे ये मुमकिन है रवानी तर्क कर दें बर्क़ के धारे ये मुमकिन है ज़मीन-ए-पाक अब नापाकियों को ढो नहीं सकती वतन की शम्-ए-आज़ादी कभी गुल हो नहीं सकती कहो हिन्दोस्ताँ की जय कहो हिन्दोस्ताँ की जय वो हिन्दी नौजवाँ या'नी अलम-बरदार-ए-आज़ादी वतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादी वो पाकीज़ा शरारा बिजलियों ने जिस को धोया है वो अँगारा कि जिस में ज़ीस्त ने ख़ुद को समोया है वो शम्-ए-ज़िंदगानी आँधियों ने जिस को पाला है इक ऐसी नाव तूफ़ानों ने ख़ुद जिस को सँभाला है वो ठोकर जिस से गीती लर्ज़ा-बर-अंदाम रहती है वो धारा जिस के सीने पर अमल की नाव बहती है छुपी ख़ामोश आहें शोर-ए-महशर बन के निकली हैं दबी चिंगारियाँ ख़ुर्शीद-ए-ख़ावर बन के निकली हैं बदल दी नौजवान-ए-हिन्द ने तक़दीर ज़िंदाँ की मुजाहिद की नज़र से कट गई ज़ंजीर ज़िंदाँ की कहो हिन्दोस्ताँ की जय कहो हिन्दोस्ताँ की जय कहो हिन्दोस्ताँ की जय......
Makhdoom Mohiuddin
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इक जवान इक मर्द-ए-दाना के क़रीब आया और मिन्नत से बोला ऐ हबीब वो फुलाँ इक दोस्त है जो आप का आप को वो कहता रहता है बुरा सुन के ये उस मर्द-ए-दाना ने कहा एक ही की भाई उस ने तो ख़ता कीं ख़ताएँ तीन तुम ने एक दम है मुझे उस से सिवा इस का अलम एक तो ये दोस्त को दुश्मन किया तुम ने उस से मुझ को यूँँ बद-ज़न किया दूसरी खोया ख़ुद अपना ए'तिबार और हुए मेरी नज़र में आप ख़ार की जो ग़ीबत तीसरी ये है ख़ता इस से भी नाराज़ होता है ख़ुदा अब तो ऐसे काम से तौबा करो मान लो मेरी ख़ुदारा मान लो वाक़ई 'जौहर' का कहना है बजा सच कहा है उस ने जो कुछ भी कहा
Banne Miyan Jauhar
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आओ बच्चो सामने बैठो क़िस्सा एक सुनाऊँ तुम को जंगल में इक भूक का मारा लकड़ी लाने गया बेचारा जंगल में थी नद्दी गहरी गिर गई बेचारे की कुल्हाड़ी क्या करूँँ दिल में सोच रहा था इतने में इक आदमी आया कहने लगा क्यूँँ तुम हो फ़सुर्दा कुछ तो बताओ क्या है सदमा बोला वो मैं क्या कहूँ भाई मैं ने कुल्हाड़ी अपनी गँवाई इस नद्दी ही में वो पड़ी है हालत मेरी आह बुरी है नद्दी में तब कूद गया वो कैसा बहादुर इंसाँ था वो मिल गई नद्दी में वो कुल्हाड़ी ग़ोता मारा और निकाली देखा तो वो सोने की थी पूछा क्या है यही तुम्हारी बोला ये नहीं मेरी भाई डुबकी उस ने और लगाई अब लोहे की उस ने निकाली फिर पूछा क्या ये है तुम्हारी देख के ये ख़ुश हो गया उस को और कहा हाँ यही थी देखो ले कर ख़ुश-ख़ुश घर को सिधारा कितना सच्चा था बेचारा देख के सोने की वो कुल्हाड़ी उस की निय्यत ज़रा न बदली जी में अगर लालच कुछ होता सोने की हरगिज़ न वो खोता बुरा है लालच सच है अच्छा 'जौहर' का भी यही है कहना
Banne Miyan Jauhar
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इक मुफ़्लिस के चार थे बच्चे दाल और रोटी जौ खाते थे खाते उसी को समझ के ने'मत लब पे न लाते कोई शिकायत लेकिन उन में इक लड़का था उस को न भाया ऐसा खाना इक लड़के का दोस्त बना वो दौलत-मंद बहुत कुछ था वो उस के घर को आता जाता उम्दा उम्दा खाने खाता लेकिन अपने दोस्त से उस की इक दिन हो गई अन-बन कोई दोस्त ने इतना मारा पीटा दाँत गिरे ख़ूँ मुँह से निकला उस दम उस को होश ये आया हिर्स का ये इनआ'म है पाया अपने हाथों खोई इज़्ज़त और उठाई ऐसी ज़िल्लत सच है बुज़ुर्गों का ये कहना लालच से तुम दूर ही रहना मिले जो दाल और रोटी खाओ शिकवा लब पे न 'जौहर' लाओ
Banne Miyan Jauhar
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चीज़ अगरचे हूँ मैं नन्ही लेकिन हूँ मैं काम की कैसी आक़ा को भी मेरी ज़रूरत नौकर को भी मेरी हाजत कोई जहाँ में घर नहीं ऐसा जिस में काम नहीं है मेरा हाल सुनाती हूँ मैं अपना कान लगा कर सारा सुनना मिट्टी में से लोहा निकाला लोहे का फ़ौलाद बनाया तार फिर उस फ़ौलाद का खींचा हो गया वो तब दुबला पतला कर दिया उस को टुकड़े टुकड़े हो गए जब वो टुकड़े छोटे कल में इन टुकड़ों को डाला बन गई जब मैं सब को निकाला एक तरफ़ अब नोक है बच्चो एक तरफ़ है नाका देखो सूई जहाँ में अब कहलाई काम ज़माने भर के आई काम हर इक के तुम भी आना मानो 'जौहर' का फ़रमाना
Banne Miyan Jauhar
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शाम हुई है सूरज डूबा रंग ज़माने का है बदला शाम सुहानी देखो आई कैसा सुहाना वक़्त है लाई दिल को लुभा लेता है कैसा चैन हमें देता है कैसा शाम का अच्छा अच्छा मंज़र दिल को लुभाने वाला मंज़र घर को चला है खेती वाला मेहनत से सब तन है काला बैल भी छोड़ा हल भी छोड़ा घर की जानिब मुँह को मोड़ा हाँका वो बैलों को अपने चला वो घर को धी में धी में खेत से अपने घर को सिधारा लेगा अब आराम बेचारा बैलों को खूँटों से बाँधा सामने उन के भूसा डाला बैठा ख़ुद बच्चों में जा कर कैसा ख़ुश है उस का घर भर इधर उधर से चिड़ियाँ उड़ कर आ बैठीं शाख़ों के ऊपर अब ये शब भर लेंगी बसेरा सुब्ह को फिर खेतों का फेरा झील किनारे आ कर बैठी दम लेने को हर मुर्ग़ाबी तुम भी बच्चो खेलना छोड़ो अपने अपने घर को चल दो सारा दिन राहत से गुज़रा 'जौहर' शुक्र करो ख़ालिक़ का
Banne Miyan Jauhar
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