nazmKuch Alfaaz

चीज़ अगरचे हूँ मैं नन्ही लेकिन हूँ मैं काम की कैसी आक़ा को भी मेरी ज़रूरत नौकर को भी मेरी हाजत कोई जहाँ में घर नहीं ऐसा जिस में काम नहीं है मेरा हाल सुनाती हूँ मैं अपना कान लगा कर सारा सुनना मिट्टी में से लोहा निकाला लोहे का फ़ौलाद बनाया तार फिर उस फ़ौलाद का खींचा हो गया वो तब दुबला पतला कर दिया उस को टुकड़े टुकड़े हो गए जब वो टुकड़े छोटे कल में इन टुकड़ों को डाला बन गई जब मैं सब को निकाला एक तरफ़ अब नोक है बच्चो एक तरफ़ है नाका देखो सूई जहाँ में अब कहलाई काम ज़माने भर के आई काम हर इक के तुम भी आना मानो 'जौहर' का फ़रमाना

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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इक मुफ़्लिस के चार थे बच्चे दाल और रोटी जौ खाते थे खाते उसी को समझ के ने'मत लब पे न लाते कोई शिकायत लेकिन उन में इक लड़का था उस को न भाया ऐसा खाना इक लड़के का दोस्त बना वो दौलत-मंद बहुत कुछ था वो उस के घर को आता जाता उम्दा उम्दा खाने खाता लेकिन अपने दोस्त से उस की इक दिन हो गई अन-बन कोई दोस्त ने इतना मारा पीटा दाँत गिरे ख़ूँ मुँह से निकला उस दम उस को होश ये आया हिर्स का ये इनआ'म है पाया अपने हाथों खोई इज़्ज़त और उठाई ऐसी ज़िल्लत सच है बुज़ुर्गों का ये कहना लालच से तुम दूर ही रहना मिले जो दाल और रोटी खाओ शिकवा लब पे न 'जौहर' लाओ

Banne Miyan Jauhar

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इक जवान इक मर्द-ए-दाना के क़रीब आया और मिन्नत से बोला ऐ हबीब वो फुलाँ इक दोस्त है जो आप का आप को वो कहता रहता है बुरा सुन के ये उस मर्द-ए-दाना ने कहा एक ही की भाई उस ने तो ख़ता कीं ख़ताएँ तीन तुम ने एक दम है मुझे उस से सिवा इस का अलम एक तो ये दोस्त को दुश्मन किया तुम ने उस से मुझ को यूँँ बद-ज़न किया दूसरी खोया ख़ुद अपना ए'तिबार और हुए मेरी नज़र में आप ख़ार की जो ग़ीबत तीसरी ये है ख़ता इस से भी नाराज़ होता है ख़ुदा अब तो ऐसे काम से तौबा करो मान लो मेरी ख़ुदारा मान लो वाक़ई 'जौहर' का कहना है बजा सच कहा है उस ने जो कुछ भी कहा

Banne Miyan Jauhar

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इक लड़के की रंगीं दस्ती एक लड़के ने आ के चुराई इधर उधर वो ढूँड रहा था किसी ने चुपके से ये बताया फुलाँ ने तेरी दस्ती चुराई गया वो फ़ौरन देखा पाई उस ने उस को ख़ूब ही मारा चोर सभों ने कह के पुकारा सुना जो उस के बाप और माँ ने मारा और हुए नाराज़ उस से इक चोरी करने से बच्चो कितनी दुर्गत होती है देखो कभी न भूल के चोरी करना होगे वर्ना तुम भी रुस्वा छोटे बड़ों को होगी नफ़रत कुछ न रहेगी तुम्हारी इज़्ज़त कभी न भूल के चोरी करना कान मिरे कहने पर धरना 'जौहर' है इक तुम्हारा भाई चाहता है ये सब की भलाई

Banne Miyan Jauhar

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आओ बच्चो सामने बैठो क़िस्सा एक सुनाऊँ तुम को जंगल में इक भूक का मारा लकड़ी लाने गया बेचारा जंगल में थी नद्दी गहरी गिर गई बेचारे की कुल्हाड़ी क्या करूँँ दिल में सोच रहा था इतने में इक आदमी आया कहने लगा क्यूँँ तुम हो फ़सुर्दा कुछ तो बताओ क्या है सदमा बोला वो मैं क्या कहूँ भाई मैं ने कुल्हाड़ी अपनी गँवाई इस नद्दी ही में वो पड़ी है हालत मेरी आह बुरी है नद्दी में तब कूद गया वो कैसा बहादुर इंसाँ था वो मिल गई नद्दी में वो कुल्हाड़ी ग़ोता मारा और निकाली देखा तो वो सोने की थी पूछा क्या है यही तुम्हारी बोला ये नहीं मेरी भाई डुबकी उस ने और लगाई अब लोहे की उस ने निकाली फिर पूछा क्या ये है तुम्हारी देख के ये ख़ुश हो गया उस को और कहा हाँ यही थी देखो ले कर ख़ुश-ख़ुश घर को सिधारा कितना सच्चा था बेचारा देख के सोने की वो कुल्हाड़ी उस की निय्यत ज़रा न बदली जी में अगर लालच कुछ होता सोने की हरगिज़ न वो खोता बुरा है लालच सच है अच्छा 'जौहर' का भी यही है कहना

Banne Miyan Jauhar

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शाम हुई है सूरज डूबा रंग ज़माने का है बदला शाम सुहानी देखो आई कैसा सुहाना वक़्त है लाई दिल को लुभा लेता है कैसा चैन हमें देता है कैसा शाम का अच्छा अच्छा मंज़र दिल को लुभाने वाला मंज़र घर को चला है खेती वाला मेहनत से सब तन है काला बैल भी छोड़ा हल भी छोड़ा घर की जानिब मुँह को मोड़ा हाँका वो बैलों को अपने चला वो घर को धी में धी में खेत से अपने घर को सिधारा लेगा अब आराम बेचारा बैलों को खूँटों से बाँधा सामने उन के भूसा डाला बैठा ख़ुद बच्चों में जा कर कैसा ख़ुश है उस का घर भर इधर उधर से चिड़ियाँ उड़ कर आ बैठीं शाख़ों के ऊपर अब ये शब भर लेंगी बसेरा सुब्ह को फिर खेतों का फेरा झील किनारे आ कर बैठी दम लेने को हर मुर्ग़ाबी तुम भी बच्चो खेलना छोड़ो अपने अपने घर को चल दो सारा दिन राहत से गुज़रा 'जौहर' शुक्र करो ख़ालिक़ का

Banne Miyan Jauhar

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