शाम हुई है सूरज डूबा रंग ज़माने का है बदला शाम सुहानी देखो आई कैसा सुहाना वक़्त है लाई दिल को लुभा लेता है कैसा चैन हमें देता है कैसा शाम का अच्छा अच्छा मंज़र दिल को लुभाने वाला मंज़र घर को चला है खेती वाला मेहनत से सब तन है काला बैल भी छोड़ा हल भी छोड़ा घर की जानिब मुँह को मोड़ा हाँका वो बैलों को अपने चला वो घर को धी में धी में खेत से अपने घर को सिधारा लेगा अब आराम बेचारा बैलों को खूँटों से बाँधा सामने उन के भूसा डाला बैठा ख़ुद बच्चों में जा कर कैसा ख़ुश है उस का घर भर इधर उधर से चिड़ियाँ उड़ कर आ बैठीं शाख़ों के ऊपर अब ये शब भर लेंगी बसेरा सुब्ह को फिर खेतों का फेरा झील किनारे आ कर बैठी दम लेने को हर मुर्ग़ाबी तुम भी बच्चो खेलना छोड़ो अपने अपने घर को चल दो सारा दिन राहत से गुज़रा 'जौहर' शुक्र करो ख़ालिक़ का
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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इक जवान इक मर्द-ए-दाना के क़रीब आया और मिन्नत से बोला ऐ हबीब वो फुलाँ इक दोस्त है जो आप का आप को वो कहता रहता है बुरा सुन के ये उस मर्द-ए-दाना ने कहा एक ही की भाई उस ने तो ख़ता कीं ख़ताएँ तीन तुम ने एक दम है मुझे उस से सिवा इस का अलम एक तो ये दोस्त को दुश्मन किया तुम ने उस से मुझ को यूँँ बद-ज़न किया दूसरी खोया ख़ुद अपना ए'तिबार और हुए मेरी नज़र में आप ख़ार की जो ग़ीबत तीसरी ये है ख़ता इस से भी नाराज़ होता है ख़ुदा अब तो ऐसे काम से तौबा करो मान लो मेरी ख़ुदारा मान लो वाक़ई 'जौहर' का कहना है बजा सच कहा है उस ने जो कुछ भी कहा
Banne Miyan Jauhar
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इक लड़के की रंगीं दस्ती एक लड़के ने आ के चुराई इधर उधर वो ढूँड रहा था किसी ने चुपके से ये बताया फुलाँ ने तेरी दस्ती चुराई गया वो फ़ौरन देखा पाई उस ने उस को ख़ूब ही मारा चोर सभों ने कह के पुकारा सुना जो उस के बाप और माँ ने मारा और हुए नाराज़ उस से इक चोरी करने से बच्चो कितनी दुर्गत होती है देखो कभी न भूल के चोरी करना होगे वर्ना तुम भी रुस्वा छोटे बड़ों को होगी नफ़रत कुछ न रहेगी तुम्हारी इज़्ज़त कभी न भूल के चोरी करना कान मिरे कहने पर धरना 'जौहर' है इक तुम्हारा भाई चाहता है ये सब की भलाई
Banne Miyan Jauhar
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इक मुफ़्लिस के चार थे बच्चे दाल और रोटी जौ खाते थे खाते उसी को समझ के ने'मत लब पे न लाते कोई शिकायत लेकिन उन में इक लड़का था उस को न भाया ऐसा खाना इक लड़के का दोस्त बना वो दौलत-मंद बहुत कुछ था वो उस के घर को आता जाता उम्दा उम्दा खाने खाता लेकिन अपने दोस्त से उस की इक दिन हो गई अन-बन कोई दोस्त ने इतना मारा पीटा दाँत गिरे ख़ूँ मुँह से निकला उस दम उस को होश ये आया हिर्स का ये इनआ'म है पाया अपने हाथों खोई इज़्ज़त और उठाई ऐसी ज़िल्लत सच है बुज़ुर्गों का ये कहना लालच से तुम दूर ही रहना मिले जो दाल और रोटी खाओ शिकवा लब पे न 'जौहर' लाओ
Banne Miyan Jauhar
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ऐ मिरी प्यारी अम्माँ आना निन्दिया आई मुझ को सुलाना सुस्त हैं आ'ज़ा मेरे सारे आँखें बंद हैं नींद के मारे खाना पीना बातें करना कुछ भी मुझ को अब नहीं भाता अम्माँ मेरा बिस्तर लाना नींद आई है मुझ को सुलाना जल्दी फिर उठना है मुझ को देर न मकतब जाने में हो सुब्ह को जिस दम सो के उठूँगा अपने खिलौने तुम से लूँगा भाई जान अब तुम भी आओ अपने बिस्तर पर सो जाओ रात है सोने ही को बनाई सो रहो तुम भी 'जौहर' भाई
Banne Miyan Jauhar
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सुब्ह हुई और अँधेरी भागी हक़ की ख़िल्क़त सारी जागी फूलों से सब बाग़ हैं महके और पखेरू उठ कर चहके कुकड़ूँ कूँ है मुर्ग़ के लब पर फज्र हुई कहता है घर घर झिलमिल झिलमिल कर के तारे दिल को लुभा लेते थे प्यारे लेकिन वो बे-चारे सिधारे जो थे फ़लक पर चाँद सितारे सुब्ह को जाते रात को आते अपनी झलक हैं हम को दिखाते बस यही उन का काम है बच्चो इन तारों से तुम भी सबक़ लो जो कुछ भी हैं काम तुम्हारे मत घबराओ उन के मारे तुम को भी है यूँँ ही चमकना देखो काम से तुम मत थकना दुनिया में तुम इज़्ज़त पाना दौलत पाना शोहरत पाना काम वो करना नाम हो जिस से हासिल कुछ इनआ'म हो जिस से सस्ती ग़फ़्लत छोड़ो भाई इस से किस ने इज़्ज़त पाई इल्म का है दुनिया में उजाला इस से पड़े जब तुम को पाला मेहनत करना जी को लगाना आलिम बन कर इज़्ज़त पाना क़ौम-ओ-वतन की करना ख़िदमत है यही दौलत है यही राहत
Banne Miyan Jauhar
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