nazmKuch Alfaaz

नींद में चलते चलते यक-दम गिर जाते हैं ऊदे फूल शटाले के बैर बहूटी सावन की दूर उफ़ुक़ पर अर्ज़-ओ-समा को जोड़ने वाली मद्धम लाइन और उसे छूने की धुन में नन्हे नर्म गुलाबी पाँव सांवल शाम पड़े का मंज़र फैला चाँद समुंदर सारा बचपन गिर जाता है धूप की ठोकर रह जाती है

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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जाने किस की लौ का परतव पल पल जलती बुझती आँखें जाने किस की मध भरी मुस्कान का हीला डावाँ-डोल लरज़ती बस्ती इक बे अंत सा आलम है इक पैहम सी गर्दिश है इक अंधा सा हाला है और हाले में गुम-सुम रूहें आगाही का भारी पत्थर सर पर उठाए अदम-आगाही के महलों के दर खुलने की आशा बाँधे सदियों से लाइन में लगी हैं पहले किस की मुक्ती होगी

Parveen Tahir

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समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप चाप बैठा है अभी कुछ देर ही पहले तलातुम ख़ेज़ मौजें थीं ज़माना उस की ठोकर पर समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप-चाप बैठा है थका-माँदा किसी हारे खिलाड़ी की तरह लेकिन अचानक ही किसी मानूस ख़ुश्बू ने उसे चौंका दिया है सामने मा'सूम नदिया साँस रोके दम-ब-ख़ुद हैराँ समुंदर की उदासी देखती है मिरी ओमा चली आओ पुरानी रीत सदियों की नदी सागर से मिलती है सदा मिलती रहेगी मिरी अज़्मत मिरी वुसअ'त कि जिस पर नाज़ था मुझ को वो बस इक इल्तिबास-ए-वक़्त था अब तो मिरे पानी में गदलाहट है मिरे ज़ाइक़े में खारे-पन की काट है ऐसी कि सैराबी किसी भी तिश्ना-लब की हो नहीं सकती फ़क़त तू ही तो पाकीज़ा तिरे बहते हुए पानी में वो तासीर है जो सात क़ुल्ज़ुम की कसाफ़त को मिटा डाले मिरी ओमा ज़माना झूट है लेकिन तो सच्चाई ये रिश्ते आँख का धोका मगर तू चश्म-ए-बीना और बीनाई महा-सागर तुझ तो याद है सच्चे ज़मानों से मिरा वो गुनगुनाता रास्ता सीधा तुम्हारी ओर आता था मगर तू किस क़दर मग़रूर था तेरी र'ऊनत ने फ़क़त इक नाँ के बूते पर मिरे अल्हड़ बहाव को वहीं पर रोक डाला था मैं नदिया थी सफ़र नदिया के पानी की वदीअ'त है मुझे बहना था हर सूरत किसी भी तौर चलना था मुदव्वर घाटियों दिलबर ज़मीनों और मैदानों ने फ़य्याज़ी से मुझ को रास्ता बख़्शा महा-सागर मुझे अब लौट जाना है हसीं सूरज की किरनों से मिलन कर के अभी बादल बनाना है मुझे चटयल ज़मीनों गर्म मैदानों को भूरी घाटियों को सात रंगी पेंग का एहसान लौटाना है बिन जल के जो धरती है वहाँ सब्ज़ बिछाना है

Parveen Tahir

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अजब पेड़ थे वो कि छितनार छाया भी झुलसा रही थी वो क्या सर ज़मीं थी जो पेड़ों के नीचे से खिसके चले जा रही थी बहुत बे-तअय्युन सी सम्तें बुझी थीं निगाहों के आगे ख़लाओं सी वीराँ वो कोई फ़ज़ा थी किसी हद-ए-इम्काँ का आग़ाज़ था या किसी बे-ज़मानी की वो इंतिहा थी

Parveen Tahir

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ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं तू ने हटाए पर्दा-हा-ए-ख़ुशनुमा वो जिन के पीछे छुप के बैठी ज़िंदगी पहचान भी पाते तो कैसे ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं काँटों पे तू ने जब घसीटा तो सुबुक फूलों में तलने की किताबी ख़्वाहिशों से जान छूटी ऐ ज़माने तू ने हम को तज्रबा-ए-गाह-ए-नफ़ी में ला के फेंका तो तबाह ज़ात की असली गुज़रगाहों का नज़ारा मिला ऐ ज़माने हम को बतलाया है तू ने दूसरों के पाँव में रहने पड़े रहने से वो जा आस्ताना दिल का बन सकती नहीं मन की मुरादें बर तो आती हैं मगर अपने ही दर को खटखटाने से लगन को आज़माने से ज़माने हम तिरी

Parveen Tahir

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हबीब-ए-जाँ तुम अगर वबा के दिनों में आए तो ब-सद अक़ीदत-ओ-मोहब्बत तुम्हारे हाथ चूमूँगी क्यूँँकि ये मेरे मसीहा के हाथ हैं तुम्हारी चादर को अपने हाथों से तह कर के अपने सिरहाने रखूँगी कि इस बकल की हरारत मुझ पर कश्फ़ के दर खोलती है तुम्हारे जूतों को क़रीने से जोड़ कर पलंग के पास रखूँगी तुम्हारे साथ एक प्लेट में खाना खाऊँगी और तुम्हारी ज़िद्दी नज़रों का भरम रखूँगी न-जाने मुझे क्यूँ लगता है कि वबा की आँख में मोहब्बत करने वालों के लिए कुछ हया बाक़ी होगी

Parveen Tahir

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