"दूसरा ब्याह कर ले गया" लाल जोड़ा तुम्हारे धवल रूप पर देखता सामने बैठ कर मैं रहा तुम नए साजना संग विवाहित हुईं रो हमारा विरह देख कर मैं रहा जो घड़ा प्यार का मैं बनाता रहा वो घड़ा दूसरा कौन भर ले गया प्यार हम ने किया था सफल ना हुआ अब उसे दूसरा ब्याह कर ले गया सात फेरे तुम्हारे व प्रियतम के संग सात जन्मों विरह की निशानी बने प्यार के थे अधूरे दो किरदार हम प्यार की जो अमर इक कहानी बने भाग्य में जो नहीं थीं मिली ना हमें भागवाला मृदुल वो अधर ले गया प्यार हम ने किया था सफल ना हुआ अब उसे दूसरा ब्याह कर ले गया
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए
Dharmesh bashar
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे
Rohit tewatia 'Ishq'
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